Skip to main content

Posts

पैथालोजिकल पोस्टमार्टम (pathological postmortem )

सूक्ष्म कथा : पैथालोजिकल पोस्टमार्टम ( ‘कफ़न’ को याद करते हुये ) ************************** ************** “हम लोगों आखिर हार गये थे | दो हफ्तों से , बेड नबर १७ के मरीज को हमारे डीन पैथालोजिकल अध्ययन के रूप खुद देख रहे थे | सारी दवाइयां उस बच्ची के सिकुड़े लीवर को आकार में नहीं ला सकी थी | जब हमने उसे मरा घोषित किया तो उसके साथ आयी उसकी माँ और नानी के चेहरों पर दुःख और राहत एक साथ दिखी | वे उड़िय ा लेबर थे जो शहर के ड्रीम प्रोजेक्ट के लिए ठेके पर लाये गये थे | शायद अब वे अपनी रोज़ी पर वापस लौट सकती थीं |वे हमारे देखते देखते बॉडी को लेकर बाहर निकल गये | लेकिन डीन को जैसे ही खबर हुई वे उबल पड़े कि बॉडी को जाने कैसे दिया ?उसको रोको उसका पैथालोजिकल पोस्टमार्टम केस को समझने के लिए जरूरी है | हमने उल्टे पाँव बॉडी के लिये दौड़ लगायी वे लोग मेन गेट के बाहर ही मिल गये | माँ तो कुछ नहीं बोली लेकिन नानी अड़ गयी कि ‘बेटी अपनी मौत मरी है ..उसे चीर फाड़ नहीं होने दूँगी.तुम लोग उसका गुर्दा कलेजी सब निकाल लोगो|’.. उसकी अड़ी पर देखते देखते मजमा जमा हो गया और बॉडी को वापस पाना मुश्किल हो गया | अंत में अस्पताल क...

सफेदा (drug abuse )

सूक्ष्म कथा : सफेदा  ++++++++++++++++++++++ प्लेटफॉर्म नम्बर ४ की सीढ़ी पर भीड़ जमा थी | बीच में एक हवलदार लाश का पंचनामा बना रहा था | मैंने भी भीड़ के भीतर सर डाला तो देखा कि एक १० – १२ बरस का बच्चा होगा ...मरियल और मैला सा .. शर्ट और पेंट उम्र से बड़े और फटे .. मुठ्ठी में एक रुमाल भिंचा था मानो उसे भींचकर सो गया हो.... हवलदार बडबडा रहा था “इसकी **** नशेड़ी था ..भो***...दिन का नाश कर दिया स्याले ने . .” मैंने गौर से देखा.. ....अरे ये तो ‘वो’ ही था | ‘वो’ मुझे कई दिनों से लगातार मिल रहा था | इंटर सिटी में घुसता और शर्ट उतारकर फर्श साफ़ करने लगता और फिर भीख मांगता | मुझे लगा यह अच्छा केस मटेरियल हो सकता है,सो मैं धीरे धीरे उससे खुलने लगा| एक बार मैंने टिफिन खोलकर पराठा बढ़ाया तो उसने पहले ना की ... फिर अपनी जेब में रख लिया ..बोला बाद में खायेगा ... फिर टूटा हाथ दिखाते हुये कहा कि यदि अभी खाया तो ‘खली’ दूसरा हाथ भी तोड़ देगा | खली कहता है कि मरियल या अपाहिज को ही भीख मिलती है | अगली दफे मैंने उसे ५ का सिक्का दिया | एक बार १० का सिक्का दिखाकर पूछा इसका क्या खरीदोगे ? “सफेदा”..उसने कहा “क्यों...

बारिश और भैरव (rain and bhairav )

सूक्ष्म कथा : बारिश और भैरव  __________________________ ______ आषाढ़ का भूला मानसून सावन में झमाझम लौट आया था | मौसम जरा खुला तो सावन महोत्सव की कड़ी में बिड़ला मंदिर चौराहे पर शानदार कवि सम्मेलन आयोजित किया गया |  कवि ‘चातक’ ने टेर भरी .. “बारिश आसमान की बहती आँख है  विरह विदग्ध धरती के हृदय से उठता धुँआ है | बारिश सृष्टि का मंगल गान है बार्रिश सूखे अधरो पर स्निग्ध मुस्कान है ||” अगले कवि ‘समर शेष’ दहाड़े .. “बारिश यानी मेघो का कुपित राग गर्जन है चपल तड़ित का तांडव नर्तन है ..| बारिश विप्लव का हरकारा है बारिश सर्व क्रान्ति की धारा है ||” अब कवि ‘पल्लव’ की बारी थी जिन्होंने तान भरी “ बारिश किसान की पथरायी आँखों का हरियाया सपना है , प्रकृति सुन्दरी की हरी भरी चूनर पर इन्द्रधनुष का गहना है ..|” शामियाने में वाह-वाह, आह-आह की चपर चपर के बीच काव्य सरिता अठखेलियाँ कर ही रही थी कि इस बीच मंदिर के सामने बैठे भिखारियों में से एक अपने लूँगड़े को उठाकर सीधे शामियाने में घुसा और कोई कुछ समझ पाता कि मंच पर चढ़ बैठा | ‘अरे ये तो जन कवि भैरव है’भीड़ में से कोई चिल्लाया | भैरव पहले पागल घोषित ...

सशक्तिकरण दौड़ (empowerment of woman )

सूक्ष्म कथा : सशक्तिकरण दौड़  ************************** ***** सरकार ने महिला सशक्तिकरण दौड़ का आयोजन किया | जिसमे साहब को महिलाओं को सशक्त करने के लिए दौड़ने जाना था |तो आज उनकी "वे" को छ: बजे की जगह आज पांच बजे उठना पड़ा | साहब को दो की जगह उन्हें तीन 'बेड टी' देनी पड़ी तब कही जाकर वे दौड़ने लायक हुए |  जैसे ही दौड़कर वापस आये उनकी ‘वे’ उनके जूते ..ट्रेक शूट सहेजने और उनकी नहाने-खाने-जाने की तैयारी  के लिए दौड़ने लगीं | उधर पड़ोसी मैडम को भी अपने विभाग की ओर से दौड़ने जाना था तो आज उन्हें भी छ : की जगह आज पांच बजे उठना पड़ा | नाश्ता और बच्चोके टिफिन तैयार कर वे किसी तरह घर से निकलीं | अभी अभी दौड़कर उन्होंने भीतर कदम ही रखा था ..पति चार मुख से चिल्लाये . मोज़े कहाँहैं ..? घंटे भर से फ़ाइल नहीं मिल रही ...और रूमाल आज धोया क्यों नहीं ?... ये मोबाइल चार्ज क्यों नही है ...? और मैडम थीं कि फिर से दौड़ने लगीं ... सरकार का मानना है कि दौड़ से महिला सशक्तिकरण होता है |||  face book 27/8/ 2014

बारिश (rain )

बारिश: एक अललित निबंध  ************************** ***************** बारिश आती है तो और बच्चों की तरह हम भी बारिश में कपडे उतारकर पानी में छप्पा छाई करते है ...लेकिन दो चार बारिश में भीतर और बाहर का फर्क मिट जाता है ..जब पन्नी की तिरपाल छलनी हो जाती है और हमें लगता है हम चलनी के नीचे बैठे या सोयें है | फिर हफ़्तों हो जाते है एक ही गीली पेंट पहने पहने और कमर से लेकर जांघ तक खुजली से सब लाल हो जाता है  | बारिश का हमारे लिए मतलब है मच्छर मेढक और कीड़े की मेहमानी | अभी.. देखो ना मलेरिया में छोटू का शरीर कैसे तवा हो गया है? पिछले साल बारिश में बस्ती में पानी घुसा तो कीड़ा भी बहकर आ गया और बेचारी नन्नी ...| वैसे बारिश में बस्ती में दो चार का मरना कोई बात नहीं है | कभी दीवार फूलकर गिर जाती है तो कभी कोई बच्चा सड़क के किनारे के गड्डे में डूबकर मर जाता है जैसे इस बार दीपक की छोटी बहन .... मेरी कलाई में भी इस बार एक राखी कम बंधेगी | बारिश के शुरू में तो माई भी कहती है रे दउ किरपा है किरपा ... लेकिन कुछ दिन चढ़ते ही गरियाने लगती है .. ’नासपीटे बादल ..कही और क्यों नहीं जाते .?..हफ्ते भर से ठेल...

मै बारिश ही हूँ ( i m rain )

सूक्ष्म कथा : मै बारिश ही हूँ ++++++++++++++++++++++++++ + बालकनी में हम तीन थे ..मै .. चार्ली और कालिदास और हाँ चौथा भी था लेकिन नहीं के बराबर ..यानी मेरी पत्नी ....जो गिलास -बर्फ-सोडा फिंगरचिप्स के साथ बालकनी और किचन के बीच दौड़ रही थी | बालकनी के बाहर बारिश थी जैसे वर्ड्स वर्थ ..लोंग्फेलो..विटमेन की कविताओं की एक काकटेल आसमान से बरस रही हो .... एक शीतल सरगम ... ध म रे नि सा..साSSSSSSS  गांधार  तक आते आते चार्ली सेंटी हो गया और बोला .. “ जानते हो मुझे बारिश का मौसम क्यों पसंद है .?.क्योंकि इसमें मै अपने आंसुओं को छुपा सकता हूँ |” “और मुझे इसलिए पसंद है क्योंकि मुझे लगता है कि मल्लिका के लिए मेरा हृदय अकेले नहीं रो रहा ...साथ में आसमान भी रो रहा है |” ..कालिदास ने पंचम लगाया और तुम्हे ??? दोनों मेरी ओर पलटे .. “ मुझे इसलिए पसंद है कि बारिश मुझे हँसने का एक बहाना देती है मुझे लगता है कि बारिश ने मेरे हिस्से का भी रो लिया है |” मैंने धैवत छेड़ा .. हम सब अपनी सरगम पूरी कर चुके थे कि नज़र कोने में रेलिंग पर टिकी पत्नी पर टिक गयी ..| तुम्हे बारिश क्यों पसंद है ? मैंने पूछा .. “ मै ब...

सिल-बट्टा

कथा : सिल-बट्टा ... ++++++++++++++++++ दादी सास मरी तो उनका लकड़ी का सन्दूक पलंग के नीचे से बाहर निकाला गया | कभी पूरी हवेली उनकी तर्जनी पर नाचती थी | फिर वे एक कमरे तक सिमटती गयीं और फिर पलंग ही उनका संसार हो गया था | उन्होंने शरीर के जेवर उतारकर बहुओं में बाँट दिये थे | कभी बेटी-दामाद आते तो दादी पलंग के नीचे से सन्दूक निकालने को कहती और एक कपडे की गाँठ खोलकर नोट निकालती और आशीष देते हुए थमा देती  | उस गाँठ में वापस नोट कहाँ से आ जाते थे यह राज दादी सास के साथ ही .... दादी सास के संदूक को खोलकर नाती पोतों ने उसकी रहस्य भरी दुनिया में झाँका ..उनके कपड़े ..कपड़ों के नीचे कुछ देवी देवताओं की तस्वीर और उनके बीच एक बहुत पुराना लगभग गल चुका गमछा ... और सबसे नीचे .. सिल-बट्टा ...| सिल-बट्टा का निकलना था कि लगा दादी सास का भूत निकल आया हो | कहते है यह दादी सास की दादी सास के समय से था | नयी बहु आती तो इसकी पूजा करायी जाती | धोखे से पाँव लग जाता तो प्रणाम करने होते | दाल पीसनी हो या चटनी ...ये महाराज धों पोंछकर बिछाये जाते और फिर वैसे ही धो पोछकर दीवार के सहारे टिका दिये जाते | जब मिक्सी-ग्...