Skip to main content

वाइड बाल


प्रलाप ७
--------
 बीन 
मैंने
भैंस के आगे बीन बजायी
बन्दर को नौलखा हार पहनाया
गधे को चंदन का लेप किया
अंधों के आगे आंसू बहाये
बहरों को राग जैजैवंती सुनाया
लेकिन मुझे इतना भीषण अफसोस कभी ना हुआ
जितना तब हुआ
जब मैंने संस्कृति  विभाग के अफसर को कविता सुनाई |||
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@
ख़ामोशी
खुदाया
तुम खामोश ना हुआ करो
 तुम्हारी ख़ामोशी में बिजलियाँ कड़कती हैं
और ज़ोरदार चीख  अपना सर पटकती है
तुम्हारी ख़ामोशी में भयावह रोदन लिपटा होता है
तुम जैसे भी हो बोडम सिलबिल्ले
वैसे ही बने रहो |
तुम्हारी खोखली   बक बक इस नोकदार  ख़ामोशी से लाख बेहतर है
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@
कोई भी हिंसा  इस कदर जानलेवा नही हो सकती  
जितना तुम्हारा यह अहिंसक सत्याग्रह ..|||
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@
जुकाम
जुकाम एक उपहार है
जुकाम होने के कई फायदे  है
 एक तो यह कि  आप का हफ्तों से बिन नहाया मित्र आप के लिए परेशानी का सबब नहीं रह जाता|
दूसरे यह कि  दरवाजे पर कचरे का  ढेर के बगल से गुजरते हुए  आप को नगर निगम की नालायकी पर गुस्सा नहीं आता |
और सबसे बड़ा लाभ यह है कि  बाबा नागार्जुन  के खरगोश की तरह आप भी लाश से उठती बदबू के बारे में सच बोलकर मरने से ,यह कहकर बच सकते हो कि मुझे तो रात से  ही जुकाम  है  मालिक |||
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@


  बी पोजिटिव

ग़ालिब चच्चा गजब के बी पोजिटिव थे |

व्हाइट वाश के आभाव में घर की दीवार पर खरपतवार उग आयी तो तस्सली कर ली कि मियां घर में बहार आयी है |

लेकिन सुलेमान चच्चा उनके भी कान कुतर गये |
हुआ यूँ कि उनकी छत में सुराख हो गया |
और चाहने वालों ने मशवरा दिया कि  मियां मरम्मत करवा लो |
 “काहे को खां...अब तो अपुन बिना खिड़की खोले आसमान का हसीन नज़ारा कर सकते हैं |
चच्चा ने बत्तीसी निकालकर छत के सुराख को तरेरते हुए फ़रमाया||||
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@
प्रार्थना 
रे  मनमोहना ,
अब मुँह ना खोलना |
कुछ भी मत बोलना |
तुम्हारा  मुँह ऊँची कीमतों और महँगाई का  गुप्त निवास  है |
तुम जब जब अपना मुँह खोलते हो ,
कीमतें और महगाई सहसा प्रकट होकर विकट हो  जाती हैं  |

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@
 स्वर्ग 
मिसेज़ कुबेर ने मि. कुबेर से कहा
नाथ स्वर्ग में हो रही बोरियत को मिटाने के लिए आओ भारत भूमि चलकर कुछ दिन घूम आयें |
देवी ..
पेट्रोल : ७५
डीज़ल :५५
दूध : ४५
टमाटर :४०
आटा :२५ ...
................मेवे और फल का  तो दाम सुनकर ही मैं मूर्छित हो जाऊंगा | लूट लाटकर बड़े जतन से खज़ाना जमा किया है | भारत भूमि का  पर्यटन  कर इसे गवाने का हठ ना करो |
धनपति कुबेर ने कुबेरनी  को समझाया ||||
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@
पक्षी और बच्चे 

क्षितिज में शाम उतर रही थी |

और पक्षियों  की कतार अपने घोंसलों में वापस लौट रही थी |

लौटते मवेशियों की धूल और रंभाने की आवाज़ से वातावरण भर उठा था |
क्या सोच  रही हो ??””
पक्षियों की पंक्ति को कातर दृष्टि से ताक रही बुढिया से बुड्डे ने पूछा |
कुछ नहीं... सोच रही थी ...उधर शाम हुई तो सब अपने घरों में लौट चले ...इधर शाम हुई तो अपने भी ..घरों से चले गये....””
बुढिया ने नज़रें बचाते हुए कहा ........||||
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@
लिखने का समय 
...मै कुछ लिखना चाहता हूँ.... शुरुआत कैसे करूँ?
नौज़वान अफसर ने पूछा |
कहीं से नहीं ...क्योंकि तुम्हारे लिखने का सही समय अभी नहीं आया है |
लिखने का सही समय कब आएगा ??
जब लिखना जिंदा रहने से ज्यादा ज़रुरी हो जायेगा |
......कबीर ने कहा........|||
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@



परिवर्तनगाथा
आपके ज़माने और हमारे ज़माने में क्या फर्क है ?
चारागाह में फुर्सत के क्षण में पोते ने चरते हुए  दादा से पूछा |
बस गाने भर का फर्क है पोते ..
देखो तब हम  चरते हुए  महारानी विक्टोरिया के लिए गाते थे ..
ओह लार्ड सेव ऑवर क्वीन ...
और अब तुम चरते हुए गाते हो ...भारत भाग्य विधाता ..
वर्ना चारागाह भी वही है और हम भी...
दादा ने समझाते हुए कहा ....|||
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@
क्रन्तिगाथा 
उसने  कविता में लिखा क्रांति
फिर महाकाव्य लिखा क्रान्तिगाथा
फिर तकिये की जगह क्रान्तिगाथा सिरहाने रखकर सोया
और मुस्कुराते हुए स्वप्न देखे
सुबह टायलेट में टिश्यू पेपर खत्म होने पर
जिससे काम चलाया गया
वो क्रान्तिगाथा के पन्ने ही थे ||
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@



Comments

Popular posts from this blog

तहखाना और राजयोग

तहखाना इस तयखाने की जानकारी में सिर्फ साहब और उनके चार सिपहसलार को ही   हैं | छटवां सिर्फ   मैं हूँ | साहब   के इस   तहखाने   में ऐसे ऐसे   राज़ हैं कि बाहर आ   जायें तो   हंगामा हो   जाये | आप   पूछे इसके पहले मै आपको बता   दूँ   कि मै आपको   कुछ   बता नहीं सकता सिर्फ दिखा सकता   हूँ वो भी अपने उन   इशारों से जिन्हें   आप   पढने   की योग्यता   शायद   नहीं   रखते | दरअसल मुझे इस विशेष तहखाने तक पहुँचने के अवसर की    योग्यता   अपनी सिर्फ एक   जन्मजात अयोग्यता के   कारण हासिल   हो सकी है और वो है   मेरा   जन्मजात   गूंगा और अनपढ़ होना | ना बोल सकता   ना लिख सकता इसलिए कोई खतरा   ना   समझकर साहब ने तहखाने में होने वाली गप्त वार्ताओं के समय   अपनी और मंडली की   सेवा के लिए   मेरा   चयन   किया | बोतल , सोडा , चखना , सिगरेट और खाना   परोसने भर तक मुझे वहां   रहने   की ...

जाड़े की उस रात

जाड़े की उस रात +++++++++++++++ सालीवाड़ा में वो जाड़े की एक रात थी | यहाँ से जबलपुर जाने वाली गाडी साढ़े बारह पर थी |जहाँ से बनारस के लिए मेरी ट्रेन सुबह चार बजे थी |   सालीवाड़ा  का बीमार और बदबूदार बस स्टाप चिथड़ी रजाइयों और कथरियों में घुटने मोड़ कर घुसा यहाँ वहां दुबका पड़ा था |  चाय-सिगरेट के टपरे पर एक पीला बल्ब दिलासा देते हुए जल रहा था जिसके नीचे बैठा में अपनी बस के इंतज़ार में था | जाड़े में शरीर काम करना भले बंद कर दे दिल काम   करना बंद नहीं करता और कमबख्त  यादों को जाड़ा नहीं लगता वे वैसी ही हरारत से हमारे भीतर मचलती रहती हैं | तो परियोजना का काम पूरे जोर पर था और मैं अपने घर से सात सौ किलोमीटर दूर भीमकाय मशीनों और मरियल मजदूरों के बीच पिछले तीन हफ्तों से मोबाइल पर वीडियो चैट करके जाड़े में गर्मी पैदा करने की नाकाम कोशिश जारी रखे हुए था |   सरकार किसी भी हालात में उपचुनाव में जीत पक्की करनी चाहते थी  इसलिए ऊपर से दवाब बना हुआ था,जिसके चलते मै घर जाने का कोई रिस्क नहीं ले रहा था | इस परियोजना पर ही हमारी कम्पनी की साख निर्भर थी और कम्पनी ...

कथा :राखी और कवच

कथा : राखी +++++++++++++++++ आज के दिन जब दीदी की कलाई पर राखी बांधता हूँ और उससे रक्षा का वचन लेता हूँ तो लोग कहते हैं कि मै गलत परम्परा डाल रहा हूँ..| मै कहता हूँ नही ..बस परम्परा को सही कर रहा हूँ | मेरी बात समझने के लिए आपको मेरे बचपन में जाना होगा | हम पांच थे .. माँ ,बाबू, दीदी मैं और सिम्मो | कस्बे में घर के बाहरी कमरे में ही हमारी प्रेस की दूकान थी .. माँ पड़ोस से कपड़े लाती और बाबू मुंह में बीड़ी दबाये कपड़ो पर कोयले वाला प्रेस फेरते | बीड़ी की लत ने बाबू को जवानी में ही इतना बेदम कर दिया कि अब वे सिर्फ प्रेस में कोयला भर पाते और प्रेस फेरने का काम दीदी के जिम्मे आ गया | दीदी दिन भर काली चाय पीती और प्रेस करती | हाँ मुझसे और सिम्मो से जरुर कहती दूध पीया करो ..कमज़ोर दिखते हो | मेरे कालेज पहुँचते पहुँचते जब बाबू सिर्फ दवा के भरोसे रह गये तब दीदी ने बाबू की जगह ले ली | दीदी अब प्रेस के साथ हमारी पढ़ाई लिखाई के बारे में भी पूछती | जबरिया जेब में नोट डालकर सर पर हाथ फेरते हुए कहती चिंता मत कर खूब पढ़ | मेरा कालेज खत्म भी नहीं हुआ था.. कि सिम्मो कस्बे के ऑटो वाले के साथ भाग गयी | मैने अपन...