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सिल-बट्टा

कथा : सिल-बट्टा ...
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दादी सास मरी तो उनका लकड़ी का सन्दूक पलंग के नीचे से बाहर निकाला गया | कभी पूरी हवेली उनकी तर्जनी पर नाचती थी | फिर वे एक कमरे तक सिमटती गयीं और फिर पलंग ही उनका संसार हो गया था | उन्होंने शरीर के जेवर उतारकर बहुओं में बाँट दिये थे | कभी बेटी-दामाद आते तो दादी पलंग के नीचे से सन्दूक निकालने को कहती और एक कपडे की गाँठ खोलकर नोट निकालती और आशीष देते हुए थमा देती | उस गाँठ में वापस नोट कहाँ से आ जाते थे यह राज दादी सास के साथ ही ....
दादी सास के संदूक को खोलकर नाती पोतों ने उसकी रहस्य भरी दुनिया में झाँका ..उनके कपड़े ..कपड़ों के नीचे कुछ देवी देवताओं की तस्वीर और उनके बीच एक बहुत पुराना लगभग गल चुका गमछा ... और सबसे नीचे .. सिल-बट्टा ...|
सिल-बट्टा का निकलना था कि लगा दादी सास का भूत निकल आया हो |
कहते है यह दादी सास की दादी सास के समय से था | नयी बहु आती तो इसकी पूजा करायी जाती | धोखे से पाँव लग जाता तो प्रणाम करने होते |
दाल पीसनी हो या चटनी ...ये महाराज धों पोंछकर बिछाये जाते और फिर वैसे ही धो पोछकर दीवार के सहारे टिका दिये जाते |
जब मिक्सी-ग्राइंडर आ गये तो सबको यह यह बेहूदा और फालतू लगने लगा ..और सबने एक राय कर इसे काम वाली बाई को दादी सास से छुपाकर दे दिया ...|
सिर्फ सासू माँ राज़ी ना थीं ,लेकिन किसी ने उनकी ......
सिल बट्टा वापस कैसे पहुंचा और वो भी सन्दूक में ?..सब सोच ही रहे थे कि सासू माँ उठीं और सिल बट्टे को अपने कमरे में रखवा लिया ..|
दादी सास के जाने के बाद से सासू माँ ने भी कुछ महीनों बाद पलंग पकड़ लिया...उन्होंने जब बहू को बुलाकर उसे चाभी का गुच्छा थमाया तो बहू ने एक निगाह में कमरे की तलाशी ली ..लेकिन सिल बट्टा कहीं नज़र नहीं आया ..
हाँ दादी सास वाला सन्दूक जरुर पलंग के नीचे नज़र आ रहा था |||| 


face book 29/8/ 2014

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