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कुछ कथा कुछ प्रलाप भाग १


सूक्ष्म कथा : प्रलाप


तुमने अपनी बैठक में इतने आईने क्यों लगा रखे हैं ?

क्योंकि मैं नहीं चाहता कि आगंतुक ये जाने कि मैं अंधा हूँ |
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मनमोहन या मोदी ?
मोदी ..
क्यों?
क्योंकि मुझे लाल रंग पसंद है
पहले के मुँह पर कालिख पुती है ,दूसरे के मुँह पर खून |||
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तुम बड़े होकर क्या बनोगे ?

मै बड़ा नहीं होना चाहता |
क्यों?
क्योंकि बड़े होने पर कुछ न कुछ बनाना पड़ता है , मैं बस मैं रहना चाहता हूँ |||

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हम कितने समय से चल रहे हैं, हम कब पहुँचेगें?
मैंने पूछा ..
कहीं नहीं पहुँचेगें ...
क्यों?
क्योंकि हम गोल घेरे में घूम रहे हैं |
उसने कहा ..
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तुम क्यों मरे ?
होनहार नौजवान की अकाल मृत्यु पर ईश्वर ने पुछा
क्योंकि मेरे शब्दकोष से ना शब्द गायब हो गया था |||
होनहार ने कहा ....
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गुरुदेव दक्षिणा में क्या दूँ ?

जूते
मगर द्रोणाचार्य ने तो एकलव्य से दाहिने हाथ का अंगूठा माँगा था |
उससे  तीरों का भय था  तुमसे जूतों का भय है |...
.द्रोणाचार्य ने कहा ..
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क्रांति चलकर हम तक अभी क्यों नहीं पहुँची?
उदय ने पूछा
बहस , चिंतन  मनन करने से क्रांति का सिर बहुत बड़ा हो गया है|
उसकी टाँगे इतने बड़े सिर का बोझ नहीं उठा सकती
वो घिसटते हुए आ रही है लेकिन हम तक आते आते घिस कर चवन्नी हो जायेगी |
प्रकाश ने समझाया .....
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तुम
घर फूंक सको तो हमारे साथ चलो...
कबीर  ने कहा ....
पहले घर तो बना लूं ...
कमाल ने कहा.....
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 तुम                                                             
बहस में भौकने क्यों लगते हो?
मैंने पूछा...
तुम पत्थर क्यों मारते हो ?
उसने कहा    ...|
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तुममे ,
सच कहने की हिम्मत कब आएगी ?
 मैंने पूछा... 
जिस दिन तुम सच सहने की हिम्मत जुटा लोगे ...
उसने कहा ...
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तुम कविता क्यों नहीं लिखते ?
मैंने पूछा.....
मेरे सच को किसी लिबास की ज़रूरत नहीं है
उसने कहा .....


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उसकी लाश
दलदल में धंसी मिली                             
वो बहुत उम्दा तैराक था
उसने बड़े बड़े समंदर पार किये थे
वो भूल गया था
कि दलदल को तैरकर नहीं ;
दलदल से दूर रहकर ही पार किया जा सकता है |
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वो था इसलिए कि
वो सोचता था ....
मै सोचता हूँ ;
कि मैं सोचता क्यों हूँ ?....
                       

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हवा ने घुंघरू पहन लिए थे
ख़ामोशी सितार हो गयी थी
जब आँखे जुबाँ हो गयी थीं                                    
और वो निगाह से गा रही थी ....

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