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बारिश और भैरव (rain and bhairav )

सूक्ष्म कथा : बारिश और भैरव 
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आषाढ़ का भूला मानसून सावन में झमाझम लौट आया था | मौसम जरा खुला तो सावन महोत्सव की कड़ी में बिड़ला मंदिर चौराहे पर शानदार कवि सम्मेलन आयोजित किया गया | 
कवि ‘चातक’ ने टेर भरी ..
“बारिश आसमान की बहती आँख है 
विरह विदग्ध धरती के हृदय से उठता धुँआ है |
बारिश सृष्टि का मंगल गान है
बार्रिश सूखे अधरो पर स्निग्ध मुस्कान है ||”
अगले कवि ‘समर शेष’ दहाड़े ..
“बारिश यानी मेघो का कुपित राग गर्जन है
चपल तड़ित का तांडव नर्तन है ..|
बारिश विप्लव का हरकारा है
बारिश सर्व क्रान्ति की धारा है ||”
अब कवि ‘पल्लव’ की बारी थी जिन्होंने तान भरी
“ बारिश किसान की पथरायी आँखों का हरियाया सपना है ,
प्रकृति सुन्दरी की हरी भरी चूनर पर इन्द्रधनुष का गहना है ..|”
शामियाने में वाह-वाह, आह-आह की चपर चपर के बीच काव्य सरिता अठखेलियाँ कर ही रही थी कि इस बीच मंदिर के सामने बैठे भिखारियों में से एक अपने लूँगड़े को उठाकर सीधे शामियाने में घुसा और कोई कुछ समझ पाता कि मंच पर चढ़ बैठा |
‘अरे ये तो जन कवि भैरव है’भीड़ में से कोई चिल्लाया |
भैरव पहले पागल घोषित हुये थे ,फिर एक दिन गायब हो गये थे |
उन्होंने माइक पर पहले खुद को रोक ना पाने के लिए माफ़ी मांगी फिर कुछ भुनभुनाते हुये अपनी पर आ गये ..
“ बारिश.... बारिश ... बड़े आये बारिश के ###..
अरे बारिश का दुःख हमसे पूछो .."
"बारिश हफ्ते भर से सड़ी हुई सब्जी ..बासी भात है
तुम्हारे लिए जो वरदान है ..हमारे पेट पर लात है
तुम बारिश का खूब चारण.. वंदन करो
पर हमारे लिए पहले एक छत का जतन करो ..||”
और माइक फेककर भैरव मंच से नीचे उतर गये ...
उनके घावो से उठती दुर्गन्ध और भिनभिनाती मक्खियों ने उनके लिए आसानी से रास्ता बना दिया |
जलसा बिगड़ चुका था ... हर चेहरे पर विस्मय और वितृष्णा की गहरी रेखा खिच गयी थी ||


face book 19/8/2014 

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