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बारिश (rain )

बारिश: एक अललित निबंध 
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बारिश आती है तो और बच्चों की तरह हम भी बारिश में कपडे उतारकर पानी में छप्पा छाई करते है ...लेकिन दो चार बारिश में भीतर और बाहर का फर्क मिट जाता है ..जब पन्नी की तिरपाल छलनी हो जाती है और हमें लगता है हम चलनी के नीचे बैठे या सोयें है | फिर हफ़्तों हो जाते है एक ही गीली पेंट पहने पहने और कमर से लेकर जांघ तक खुजली से सब लाल हो जाता है |
बारिश का हमारे लिए मतलब है मच्छर मेढक और कीड़े की मेहमानी | अभी.. देखो ना मलेरिया में छोटू का शरीर कैसे तवा हो गया है? पिछले साल बारिश में बस्ती में पानी घुसा तो कीड़ा भी बहकर आ गया और बेचारी नन्नी ...| वैसे बारिश में बस्ती में दो चार का मरना कोई बात नहीं है | कभी दीवार फूलकर गिर जाती है तो कभी कोई बच्चा सड़क के किनारे के गड्डे में डूबकर मर जाता है जैसे इस बार दीपक की छोटी बहन .... मेरी कलाई में भी इस बार एक राखी कम बंधेगी |
बारिश के शुरू में तो माई भी कहती है रे दउ किरपा है किरपा ... लेकिन कुछ दिन चढ़ते ही गरियाने लगती है ..
’नासपीटे बादल ..कही और क्यों नहीं जाते .?..हफ्ते भर से ठेला नहीं लगा... बच्चे क्या खायेंगे लूड़ा ?’
और सच में खाने के लिए कई बार लूड़ा ही बचता है, जब पास का करिया नाला बढ़कर रसोई में घुस आता है | ना चूल्हे के लिए ईंधन बचता है ना खाने के लिए राशन |हम तब तो पीने के पानी के लिए भी तरस जाते है क्योंकि सब तरफ पानी में तैरते मल को देखकर हमें...उफ्फ्फ्फ़.. कहते हुए भी उबकाई आ रही है | तब हम किसी तरह आसमान से बरसने वाले पानी को इकठ्ठा करके अपनी प्यास बुझाते हैं |
लगातार बारिश में बड़े घरों के बच्चों की स्कूल की छुट्टी हो जाती है लेकिन हमारा तो घर ही स्कूल में लग जाता है | राहत दल वहीँ हमें कम्बल और रोटी बांटता है |
फिर भी बारिश होती रहनी चाहिये | क्योंकि माई कहती है ..जब दउ बरसेगा तभी तो खेती होगी और तभी तो हमारा पेट भरने के लिए दाने आयेंगे |


face book 20/8/2014 


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