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लप्रेक :फल और मूर्ख

 फल
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सुनहरे फल को 'ही' ने चखा |
सुनहरे फल को 'शी' ने भी चखा |
चखने के बाद 'ही' का दिल आंसुओ में डूबने लगा |
पश्चाताप से दग्ध वो खुद को दंडित करने के लिए जंगल की तरफ भाग गया |
उधर चखने के बाद 'शी' का दिल सुनहरे प्रकाश से भर गया |
वो बेसुध नाचने-गाने लगी और बस्ती की तरफ ख़ुशी से दौड़ पड़ी |
"लेकिन एक ही फल का विपरीत असर क्यों हुआ ?" एक श्रोता ने पूछा |
"क्योंकि सुनहरे फल को चखते समय 'ही' पाप में था और 'शी' प्रेम में "
कथा वाचक ने व्याख्या की ||



बेबफाऔर मूर्ख  
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एक था he 
और एक थी she
मरियल सी पोखर में दोनों केली-कौतुक करते गगन-मगन थे | 
बरस दर बरस बीत रहे |
she मानो सोन मछरिया थी जिसके लिए he का प्रेम ही जीवन -जल था |
उसके अभाव की कल्पना भी करते वो तड़पने लगती |
तो उधर he मानो मेढक मक्कार था |
उसके सपने में पोखर नहीं पहाड़ आते | जिनमे वो उचक-उचक कर खुद को चढ़ता हुआ देखता |
एक दिन he को जैसे ही ज़मीन दिखी वो जल से बाहर कूदकर नौ-दो- ग्यारह हो रहा |
she रूहांसी होकर पोखर में उछलकर चिल्लाई 'बेवफा कहीं का '
he आगे जंप करते हुए जोर से टर्राया "मूर्ख कहीं की "...||हनुमंत किशोर ||

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