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कथा :राखी और कवच

कथा : राखी
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आज के दिन जब दीदी की कलाई पर राखी बांधता हूँ और उससे रक्षा का वचन लेता हूँ तो लोग कहते हैं कि मै गलत परम्परा डाल रहा हूँ..|
मै कहता हूँ नही ..बस परम्परा को सही कर रहा हूँ |
मेरी बात समझने के लिए आपको मेरे बचपन में जाना होगा |
हम पांच थे .. माँ ,बाबू, दीदी मैं और सिम्मो |
कस्बे में घर के बाहरी कमरे में ही हमारी प्रेस की दूकान थी .. माँ पड़ोस से कपड़े लाती और बाबू मुंह में बीड़ी दबाये कपड़ो पर कोयले वाला प्रेस फेरते |
बीड़ी की लत ने बाबू को जवानी में ही इतना बेदम कर दिया कि अब वे सिर्फ प्रेस में कोयला भर पाते और प्रेस फेरने का काम दीदी के जिम्मे आ गया |
दीदी दिन भर काली चाय पीती और प्रेस करती |
हाँ मुझसे और सिम्मो से जरुर कहती दूध पीया करो ..कमज़ोर दिखते हो |
मेरे कालेज पहुँचते पहुँचते जब बाबू सिर्फ दवा के भरोसे रह गये तब दीदी ने बाबू की जगह ले ली | दीदी अब प्रेस के साथ हमारी पढ़ाई लिखाई के बारे में भी पूछती | जबरिया जेब में नोट डालकर सर पर हाथ फेरते हुए कहती चिंता मत कर खूब पढ़ |
मेरा कालेज खत्म भी नहीं हुआ था.. कि सिम्मो कस्बे के ऑटो वाले के साथ भाग गयी |
मैने अपने दोस्तों के साथ ऑटो वाले को खोज निकाला और पकड़ कर जमके ठुकाई कर दी और फरार होगया | लेकिन तीसरे दिन पकड़ लिया गया और बदले में ऑटोवालों ने पुलिस की जेब गरम कर मेरी भी जमकर सुताई करवा दी |
दीदी उस रात थाने पहुंचकर जमानत करा कर घर ले आई |सिम्मो को पुलिस ने हमारे सुपुर्द कर दिया था लेकिन अगले दिन वो दुबारा चली गयी |
माँ ऑटो वाले को गरियाते हुए रोये जा रही थी | बाबू खांसते अपनी टीबी से लड़ रहे थे
एक दीदी ही थी जो अपनी डबडबाई आँखों से कभी मेरी चोटों पर सिंकाई करती | कभी माँ को शांत कराती तो भी बाबू की छाती मलती |
मुझे हल्दी दूध देते हुए सिर्फ इतना कहती .. बिगड़ मत.. कुछ बन जा |
हफ्ते भर बाद में ठीक हुआ तो दीदी ने कहा अब तू मामा के यहाँ चला जा और कुछ बनकर ही आना | और मेरे सामने मेरे कपडे किताबों का थैला रख दिया ||
उस दिन के बाद तीन साल तक तीज त्योहार में ही घर जाना हुआ | दीदी ने सब खर्चे उठाये..|
नौकरी लगने के बाद भी दीदी मुझे विदाई देती है और सर पर हाथ फेरते हुए कहती है... दूध पिया कर ...कमज़ोर दिख रहा है |
इधर सिम्मो का पति किसी और के साथ भाग गया | पता चला तो दीदी सिम्मो और उसके बच्चो को भी अपने साथ लिवा लाई और उसे बगल में प्रेस का ठेला लगवा दिया |

अब दीदी के कनपटी के बालसफेद हो चुके हैं और उसको नज़र का चश्मा भी लग गया है |
बरामदे में आज भी दीदी काली चाय पीते हुए प्रेस फेरती है और अन्दर के कमरे में जाकर समय समय पर माँ बाबू को देखती रहती है |

अब आप बताये किसने किसकी रक्षा की और आज भी कौन किसकी रक्षा कर रहा है ?
क्या अब भी आप कहेंगे मैंने गलत परम्परा डाल दी है ?


कथा : कवच
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वो ताज़ा-ताज़ा अफसर बना था |
विधवा पेंशन प्रकरण की फ़ाइल चेक कर आश्स्वत हुआ कि सारे कागज़ ठीक हैं | 
उसने घंटी बजाकर चपरासी बुलाया और उसे सम्बन्धित हितग्राही को अंदर भेजने के लिए कहा |और एहतियातन नज़र फिर से फाइल में गड़ा दी |
दरवाजा धकेलकर कोई अन्दर आया |
नज़र उठाकर देखा तो ढलती जवानी की दहलीज पर खड़ी औरत सामने खड़ी थी |
उसकी नज़र से थोड़ा सकपकाते हुए उसने अपना आँचल कसकर खीचा और हाथ जोड़ लिए|
मांग में गाढ़ा भरा सिन्दूर गले में लटकता मंगल सूत्र | हाथ में चूडिया |
उसके माथे में बल पड़े और उसने फ़ाइल की फोटो देखकर दुबारा उसे देखा |
औरत तो वही थी ...
'इसका मतलब?'
उसने मंगलसूत्र पर नज़र गड़ाते हुए पूछा |
" साहब यह तो विधवा का कवच है | घरो में झाडू पोछा करती हूँ | विधवा को निबल जानकर घर और मोहल्ले के मर्द नोच ना खायें..इसलिए ये कवच पहन रखा है |"
कहते हुए वो गिडगिड़ाई....
उसने फाइल से मुंह छुपाते हुए घंटी दबा दी |

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