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अँधा और ऐचाताना

सूक्ष्म कथा ...अंधा 
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हमारी पॉलिसी थी कि हम विकलांगऔर वृद्ध लोगों को सम्मानदेते हुए उन्हें चार्ज में से पच्चीस फीसदी रियायत भी देते थे |
उसने अपना परिचय पत्र बढ़ाया.... ब्लाइंड
मैंने जरूरी लिखापढ़ी निपटाई और उनके सम्मान में उन्हें उनके रूम तक छोड़ने गया...
रूम में टेबल-कुर्सी-फोन-फ्रिज कीजानकारी देने के बाद मैंने उन्हें बिजली के स्विच के बारे में बताया | पंखा एसी च्रार्जिंग आदि के स्विच बताकर जब मै लौटने को हुआ तो उसने मुझे टोका .. 'और लाईट का स्विच ..?'
"लाईट.. लेकिन आपको उसकी जरूरत कहाँ पड़ेगी?"मैंने हल्के से हंसते हुए तंज़ किया |
'लेकिन आपके लिए तो पड़ेगी ...ना' कहकर वो होंठों की किनारी से मुस्कुराया|
मैंने अनुभव किया कि मै आखें होते हुए भी देख नहीं पा रहा था ||


कथा : ऐंचाताना
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बात पुराने जमाने की है , जब ना तो ऐसे बाज़ार हुआ करतेप थे् और ना ज्ञान-विज्ञान ने ऐसी तरक्की की थी | तब प्रेम अंधा हुआ करता था और बेचारा गली गली मारा मारा फिरा करता था | लेकिन उसके चेहरे की लुनाई ऐसी थी कि आते जाते की टकटकी बंध जाती |
समय बीता ..
बस्ती में दूर देश के साहूकार आये.. बाज़ार आया पीछे-पीछे ज्ञान- विज्ञान आया और तय किया गया गल-गली भटकते अंधे प्रेम को रौशनी दी जाये | हालांकि प्रेम हंसकर टाल देता कि आँखों वालों से ज्यादा साफ़ दिखताहै |
लेकिन एक दिन चोबदार उसे उठा ले गया और अंधे प्रेम की आँख का आपरेशन कर दिया गया |
अब प्रेम अंधा नहीं रहा | अब वह देखता है |
बस एक गडबडी हो गयी |
वह ऐंचाताना हो गया है |
देखता कहीं और दिखाई देता है
लेकिन देख कही और रहा होता है |
जिस लड़की ने अभी प्रेमी थानेदार के साथ फेरे लिए हैं , वो यहाँ आने के पहले रोमांटिक कविताओं की अपनी किताब को अपने स्ट्रगलर क्लासमेट को समर्पित करके आयी है|
और थानेदार जी ने भी जो हीरे का लाकेट उन्हें पहनाया है वो अपनी सिपाहिन् के गले के नाप से बनवाया था ||

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