Skip to main content

progress (तरक्की )

तरक्की 
+++++++++++++++++++++
बात उन दिनों की है जब इंसान चाँद पर बस्ती बना चुका था और लम्बी सुरंग में विस्फोट कर उसने सृष्टि के जन्म की गुत्थी सुलझा ली थी | यहाँ तक कि अब वह अपनी कोख में वापस लौटकर अपनी नाक आँख त्वचा का रंग फिर से डिजाइन कर सकता था | उसने अपने जानदार पुतले बना लिये और इस तरह वो अमर हो गया था |
उन दिनों ही चमचमाती सड़कों पर एक लड़का और एक लड़की घसीटते हुए लाये गए ...उन्होंने अपने कंधो पर अपने अपने जन्म से मिले सलीब उठा रखे थे ...
भीड़ ने नारों के बीच हुकुम दिया कि दोनों को अपने अपने सलीब की जगह उनके बनाये सलीब उठाने होंगे ...
दोनों कुछ बुदबुदाये | कोई कुछ समझ पाता की भीड़ शोर के साथ उन्हें संगसार करने लगी.
आसमान में उड़ते परिंदे ने देखा और सोचा .. “अच्छा हुआ हम इंसान ना हुए ...”
बगल से गुजरते हुए कुत्ते ने देखा और सोचा .. “अच्छा हुआ इंसान के साथ रहते हुए मुझे यह छूत अब तक नहीं लगी वर्ना ....”
सभ्य बनाने के लिए लाये गये एक नंगे वनवासी ने देखा तो यह सोच कर काँप गया कि सभ्य होने के लिए क्या उसे भी यह सब करना होगा ?
शैतान ने देखा तो यह सोचकर आसमान को थर्रा देने वाला अट्टहास किया कि इन्सान जैसे जैसे बाहर तरक्की करता गया .. भीतर ही भीतर उसे भी मज़बूत करता गया |
मोहब्बत उस दौर में जानलेवा बात थी ,
सियासत ,मज़हब,रवायत, शराफत सब उसकी घात में लगे थे ....|||

Comments

Popular posts from this blog

तहखाना और राजयोग

तहखाना इस तयखाने की जानकारी में सिर्फ साहब और उनके चार सिपहसलार को ही   हैं | छटवां सिर्फ   मैं हूँ | साहब   के इस   तहखाने   में ऐसे ऐसे   राज़ हैं कि बाहर आ   जायें तो   हंगामा हो   जाये | आप   पूछे इसके पहले मै आपको बता   दूँ   कि मै आपको   कुछ   बता नहीं सकता सिर्फ दिखा सकता   हूँ वो भी अपने उन   इशारों से जिन्हें   आप   पढने   की योग्यता   शायद   नहीं   रखते | दरअसल मुझे इस विशेष तहखाने तक पहुँचने के अवसर की    योग्यता   अपनी सिर्फ एक   जन्मजात अयोग्यता के   कारण हासिल   हो सकी है और वो है   मेरा   जन्मजात   गूंगा और अनपढ़ होना | ना बोल सकता   ना लिख सकता इसलिए कोई खतरा   ना   समझकर साहब ने तहखाने में होने वाली गप्त वार्ताओं के समय   अपनी और मंडली की   सेवा के लिए   मेरा   चयन   किया | बोतल , सोडा , चखना , सिगरेट और खाना   परोसने भर तक मुझे वहां   रहने   की ...

ठूंठ

सूक्ष्म कथा : ठूंठ ********************************************************************************************************** केफेटेरिया के बगल से ढलान थी | जहाँ दोनों तरफ ऊँचे फूल पत्तियों से लदे फदे     हँसते खिलखिलाते पेड़ो की कतार थी | उसी कतार में एक ठूंठ था ...हरे भरों के बीच एक विषम संख्या | लेकिन शाम के वक्त ये ठूंठ हरा भरा हो जाता जब हज़ारो की संख्या में तोते उसकी सूखी फैली बांहों पर बैठ जाते | तोते ठूंठ का सारा नंगापन ढक लेते और ठूंठ झूठ मूठ ही सही पल भर के लिये भूल जाता कि वह अब फलफूलदार नहीं रहा | उस क्षण ठूंठ कभी   किसी दूल्हे सा इतराता   तो कभी उस माँ सा हुलस उठता जिसके बच्चे परदेश से लौट आये हों | एक दोपहर ढलान से उतरते हुये देखा ठूंठ पर कुल्हाड़े और आरे चल रहे थे उनकी आवाजों के बीच कुछ घुटी हुई सिसकियाँ सुनायी दी | वे ठूंठ की थीं या तोतों की कह नहीं सकता |   (चित्र गूगल साभार )

जाड़े की उस रात

जाड़े की उस रात +++++++++++++++ सालीवाड़ा में वो जाड़े की एक रात थी | यहाँ से जबलपुर जाने वाली गाडी साढ़े बारह पर थी |जहाँ से बनारस के लिए मेरी ट्रेन सुबह चार बजे थी |   सालीवाड़ा  का बीमार और बदबूदार बस स्टाप चिथड़ी रजाइयों और कथरियों में घुटने मोड़ कर घुसा यहाँ वहां दुबका पड़ा था |  चाय-सिगरेट के टपरे पर एक पीला बल्ब दिलासा देते हुए जल रहा था जिसके नीचे बैठा में अपनी बस के इंतज़ार में था | जाड़े में शरीर काम करना भले बंद कर दे दिल काम   करना बंद नहीं करता और कमबख्त  यादों को जाड़ा नहीं लगता वे वैसी ही हरारत से हमारे भीतर मचलती रहती हैं | तो परियोजना का काम पूरे जोर पर था और मैं अपने घर से सात सौ किलोमीटर दूर भीमकाय मशीनों और मरियल मजदूरों के बीच पिछले तीन हफ्तों से मोबाइल पर वीडियो चैट करके जाड़े में गर्मी पैदा करने की नाकाम कोशिश जारी रखे हुए था |   सरकार किसी भी हालात में उपचुनाव में जीत पक्की करनी चाहते थी  इसलिए ऊपर से दवाब बना हुआ था,जिसके चलते मै घर जाने का कोई रिस्क नहीं ले रहा था | इस परियोजना पर ही हमारी कम्पनी की साख निर्भर थी और कम्पनी ...