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ठूंठ

सूक्ष्म कथा : ठूंठ
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केफेटेरिया के बगल से ढलान थी | जहाँ दोनों तरफ ऊँचे फूल पत्तियों से लदे फदे   हँसते खिलखिलाते पेड़ो की कतार थी |

उसी कतार में एक ठूंठ था ...हरे भरों के बीच एक विषम संख्या |

लेकिन शाम के वक्त ये ठूंठ हरा भरा हो जाता जब हज़ारो की संख्या में तोते उसकी सूखी फैली बांहों पर बैठ जाते |

तोते ठूंठ का सारा नंगापन ढक लेते और ठूंठ झूठ मूठ ही सही पल भर के लिये भूल जाता कि वह अब फलफूलदार नहीं रहा | उस क्षण ठूंठ कभी  किसी दूल्हे सा इतराता  तो कभी उस माँ सा हुलस उठता जिसके बच्चे परदेश से लौट आये हों |

एक दोपहर ढलान से उतरते हुये देखा ठूंठ पर कुल्हाड़े और आरे चल रहे थे उनकी आवाजों के बीच कुछ घुटी हुई सिसकियाँ सुनायी दी | वे ठूंठ की थीं या तोतों की कह नहीं सकता |
 
(चित्र गूगल साभार )

Comments

  1. behad satik aur arthwan jaisi hamesha hoti hain ..badhai sir

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  2. मार्मिक कथा पढ़कर अपनी लिखा याद आया....

    नश्तर सा चुभता है उर में कटे वृक्ष का मौन
    नीड़ ढूँढते पागल पंछी को समझाये कौन!

    ReplyDelete

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