Skip to main content

सम्मोहन (hypnotism)

सूक्ष्म कथा : सम्मोहन
**********************************
मंच सजा हुआ था ..
रूपसज्जाकारों ने 'महाराजाधिराज' को सजा संवार कर देवोपम बना दिया था | वे सीखी हुई भंगिमाओं के साथ हाथ नचा नचा कर पवित्र मन्त्र दोहराने लगे | लाईट और कैमरे की चमक दमक भव्य सम्मोहन रच रहे थे |
जब वे जंगल में अमन और प्रेम के बारे में बोल रहे थे ... सामने बैठे एक मेमने को रुलाई छूट गयी ...जिसके परिवार को कुछ दिनों पहले ही 'महाराजाधिराज' के पालतू शिकारियों ने घेरकर मार डाला था | लेकिन मेमना जल्दी से अपने मुंह में रुमाल ठूसकर ताली बजाने लगा ...क्योंकि मंच के पीछे खड़े सियार उसे घूर रहे थे |
फिर 'महाराजाधिराज' दया ..अहिंसा ..... पर जोर जोर से बोलने लगे ...जब वे बोल रहे थे तो उनके दांतों के फंसा नर्म लाल गोश्त का टुकड़ा दिखायी दे रहा था लेकिन लोग उसे देखकर भी अनदेखा कर रहे थे क्योंकि सामने मंच पर पीछे खड़े सियार उन्हें घूरे जा रहे थे |
इधर भाषण के दौरान महाराजाधिराज ने बड़ा सा मुंह खोलकर जम्हाई ली कि एक चील तेज़ी से झपटी और दाँतो के बीच फँसा गोश्त का टुकड़ा ले उड़ी ..
महाराजाधिराज ...मंच पर पीछे खड़े सियार ..सभा सब सन्न रह गये |
अचानक महाराजाधिराज ने पहलू बदला ..
"देखिये हमारे जंगल की प्रिय चील भी शाकाहारी हो चुकी है अभी अभी उसने खाने के लिए मेरे दाँतों के बीच फँसे फल के टुकड़े को निकाला है और देखिये खा रही है ..." 'महाराजाधिराज' ने सुदूर क्षितिज की ओर इशारा करते हुए कहा |
सभा तालियों से गूंज उठी | सभा 'महाराजाधिराज' के सम्मोहन में बंध कर अपना विवेक खो चुकी थी |||||


on face book 15/8/2014 

Comments

Popular posts from this blog

तहखाना और राजयोग

तहखाना इस तयखाने की जानकारी में सिर्फ साहब और उनके चार सिपहसलार को ही   हैं | छटवां सिर्फ   मैं हूँ | साहब   के इस   तहखाने   में ऐसे ऐसे   राज़ हैं कि बाहर आ   जायें तो   हंगामा हो   जाये | आप   पूछे इसके पहले मै आपको बता   दूँ   कि मै आपको   कुछ   बता नहीं सकता सिर्फ दिखा सकता   हूँ वो भी अपने उन   इशारों से जिन्हें   आप   पढने   की योग्यता   शायद   नहीं   रखते | दरअसल मुझे इस विशेष तहखाने तक पहुँचने के अवसर की    योग्यता   अपनी सिर्फ एक   जन्मजात अयोग्यता के   कारण हासिल   हो सकी है और वो है   मेरा   जन्मजात   गूंगा और अनपढ़ होना | ना बोल सकता   ना लिख सकता इसलिए कोई खतरा   ना   समझकर साहब ने तहखाने में होने वाली गप्त वार्ताओं के समय   अपनी और मंडली की   सेवा के लिए   मेरा   चयन   किया | बोतल , सोडा , चखना , सिगरेट और खाना   परोसने भर तक मुझे वहां   रहने   की ...

ठूंठ

सूक्ष्म कथा : ठूंठ ********************************************************************************************************** केफेटेरिया के बगल से ढलान थी | जहाँ दोनों तरफ ऊँचे फूल पत्तियों से लदे फदे     हँसते खिलखिलाते पेड़ो की कतार थी | उसी कतार में एक ठूंठ था ...हरे भरों के बीच एक विषम संख्या | लेकिन शाम के वक्त ये ठूंठ हरा भरा हो जाता जब हज़ारो की संख्या में तोते उसकी सूखी फैली बांहों पर बैठ जाते | तोते ठूंठ का सारा नंगापन ढक लेते और ठूंठ झूठ मूठ ही सही पल भर के लिये भूल जाता कि वह अब फलफूलदार नहीं रहा | उस क्षण ठूंठ कभी   किसी दूल्हे सा इतराता   तो कभी उस माँ सा हुलस उठता जिसके बच्चे परदेश से लौट आये हों | एक दोपहर ढलान से उतरते हुये देखा ठूंठ पर कुल्हाड़े और आरे चल रहे थे उनकी आवाजों के बीच कुछ घुटी हुई सिसकियाँ सुनायी दी | वे ठूंठ की थीं या तोतों की कह नहीं सकता |   (चित्र गूगल साभार )

जाड़े की उस रात

जाड़े की उस रात +++++++++++++++ सालीवाड़ा में वो जाड़े की एक रात थी | यहाँ से जबलपुर जाने वाली गाडी साढ़े बारह पर थी |जहाँ से बनारस के लिए मेरी ट्रेन सुबह चार बजे थी |   सालीवाड़ा  का बीमार और बदबूदार बस स्टाप चिथड़ी रजाइयों और कथरियों में घुटने मोड़ कर घुसा यहाँ वहां दुबका पड़ा था |  चाय-सिगरेट के टपरे पर एक पीला बल्ब दिलासा देते हुए जल रहा था जिसके नीचे बैठा में अपनी बस के इंतज़ार में था | जाड़े में शरीर काम करना भले बंद कर दे दिल काम   करना बंद नहीं करता और कमबख्त  यादों को जाड़ा नहीं लगता वे वैसी ही हरारत से हमारे भीतर मचलती रहती हैं | तो परियोजना का काम पूरे जोर पर था और मैं अपने घर से सात सौ किलोमीटर दूर भीमकाय मशीनों और मरियल मजदूरों के बीच पिछले तीन हफ्तों से मोबाइल पर वीडियो चैट करके जाड़े में गर्मी पैदा करने की नाकाम कोशिश जारी रखे हुए था |   सरकार किसी भी हालात में उपचुनाव में जीत पक्की करनी चाहते थी  इसलिए ऊपर से दवाब बना हुआ था,जिसके चलते मै घर जाने का कोई रिस्क नहीं ले रहा था | इस परियोजना पर ही हमारी कम्पनी की साख निर्भर थी और कम्पनी ...