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जाड़े की उस रात

जाड़े की उस रात
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सालीवाड़ा में वो जाड़े की एक रात थी |
यहाँ से जबलपुर जाने वाली गाडी साढ़े बारह पर थी |जहाँ से बनारस के लिए मेरी ट्रेन सुबह चार बजे थी |
 सालीवाड़ा का बीमार और बदबूदार बस स्टाप चिथड़ी रजाइयों और कथरियों में घुटने मोड़ कर घुसा यहाँ वहां दुबका पड़ा था | 
चाय-सिगरेट के टपरे पर एक पीला बल्ब दिलासा देते हुए जल रहा था जिसके नीचे बैठा में अपनी बस के इंतज़ार में था |
जाड़े में शरीर काम करना भले बंद कर दे दिल काम  करना बंद नहीं करता और कमबख्त  यादों को जाड़ा नहीं लगता वे वैसी ही हरारत से हमारे भीतर मचलती रहती हैं |
तो परियोजना का काम पूरे जोर पर था और मैं अपने घर से सात सौ किलोमीटर दूर भीमकाय मशीनों और मरियल मजदूरों के बीच पिछले तीन हफ्तों से मोबाइल पर वीडियो चैट करके जाड़े में गर्मी पैदा करने की नाकाम कोशिश जारी रखे हुए था | 
सरकार किसी भी हालात में उपचुनाव में जीत पक्की करनी चाहते थी  इसलिए ऊपर से दवाब बना हुआ था,जिसके चलते मै घर जाने का कोई रिस्क नहीं ले रहा था | इस परियोजना पर ही हमारी कम्पनी की साख निर्भर थी और कम्पनी की साख पर हमारी नौकरी |मेरे बीबी बच्चे भी इस मजबूरी को समझते थे इसलिए उन्होंने भी कभी घर आने की जिद नहीं पकड़ी | लेकिन उस रात बेटे ने सिर्फ इतना पूछा कि पापा कल मेरे बर्थ डे में आप नहीं आओगे क्या ?
और फिर मैंने जवाब भले टाल दिया लेकिन अपने दिल की आवाज़ नहीं टाल पाया | एक बैग में सफ़र के लिए कपड़े ठूंसे और साईट में मौजूद भार वाहन ‘छोटा हाथी’ में बैठकर सालीवाड़ा आ पहुंचा |
भला हो ड्रायवर किशन पटेल का जिसने चिल्ला जाड़ा देखते हुए लौटते वक्त रम का पव्वा बैग में डाल दिया था  |
उसी पव्वे के भरोसे कठोर जाड़ा और इंतज़ार कटना था |
जाड़े में भले आपके आसपास की दुनिया सिकुड़ जाये लेकिन इंतज़ार फैल जाता है | उस फैले इंतज़ार को समेटने के लिए मैंने पव्वा खोल लिया  और चायवाले से  स्टील गिलास लेकर धीरे धीरे घूँट मारने लगा | 
चायवाले को अपनी कम्पनी में शामिल करने की गरज से मैंने उसे भी एक  पेग बनाकर दिया था जिसे बड़ी बेरहमी से एक साँस में घुटक कर वो कंबल ओढ़कर दुबक चुका था | बस  के आने में ढाई घंटे बाकी थे .. | 
"उफ्फ्फ ये जाड़ा ये तन्हाई और ये इंतज़ार " 
मैरी तबीयत पव्वे के असर से को थोड़ा शायराना हो चली थी |
हर घूँट के साथ मेरे ज़ेहन की सर्दी पिघलने लगी और बीबी-बच्चे, घर-शहर की तस्वीर साफ़ उभरने लगी | पिछले बर्थ डे में इस समय हम ढाबे में थे और बेटे ने अपनी तोतली जुबान से कहा था “आई लव यू पापा” और सुनने के बाद मै उसे बाहों में भरकर पूरे ३६० डिग्री पर घूम गया था | पत्नी ने तब तुरंत मोबाइल क्लिक कर दिया था |मैंने मोबाइल निकाल कर उस तस्वीर को देखा और भीतर से ३६०डिग्री पर घूम गया |
भीषण ठंड भी मेरी मुस्कान को होंठों पर नाचने से नहीं रोक पायी |
मुस्कुराते हुए मैंने घूँट मारा ही था कि किसी बच्चे के रोने जैसी आवाज़ सुनाई दी |
इतने समय यहाँ कौन होगा ..? सोचकर मैंने चारो तरफ निगाह दौड़ाई |
किसी को ना पाकर मैंने एक घूँट मारा और सोचकर दिल ही दिल में हँस दिया कि हमारे भीतर की आवाज़ हमें बाहर से किस तरह सुनाई देने लगती है |
लेकिन घूँट मारते हुए वो आवाज़ जब बराबर पीछा करती रही तो मैंने अपनी आँखे पूरी फाड़ी और चौतरफा घूरना शुरु किया | अंत में मैंने उसे खोज निकाला और अपने आप पर फिर हँस दिया वो कुत्ते का एक मरियल सा पिल्ला था जो दूर कोने में दुबका हड्डी गलाने वाले जाड़े में कंपकपा कर ‘कू-कू’ कुकिया रहा था |
“मादर...” मैंने एक गाली उसकी तरफ उछाली और बाकी वाक्य अपने भीतर खत्म किया “नशा खराब कर रहा है” |
उसे भगाने के लिए मैंने पास पड़ा पत्थर उठाया ही था कि हथेली में पत्थर के ठंडेपन का अहसास जगते ही पत्थर को वहीँ छोड़ दिया और अपने आप से कहा “जाने दो ... तुम्हे नशे की पड़ी है और उसे जिंदगी की”
घूँट मारते हुए मैंने उसे फिर देखा | लगा वो भी मेरी तरफ देख रहा है |
अब जैसे मैं उसे ,फिर उसकी आँखों को साफ़ साफ़ देख पा रहा था | उसकी 'कू –कू' साफ़ सुन पा रहा था |
“स्याली ये दारु भी कभी सब धुंधला कर देती है कभी सब साफ़ ...” मैंने अपने आप से कहा और नज़र फेर ली | लेकिन ज्यादा देर खुद को ना रोक सका और फिर उसे ताकने लगा | उस सुनसान सर्द अँधेरे में मेरे और मरियल पिल्ले के बीच आँखों ही आँखों में बात होने लगी |
“इतने मरियल क्यों हो ?”
‘कोई माई-बाप नहीं है और ऐसी नस्ल का भी नहीं हूँ कि कोई पाल ले’
“ ज़िंदा क्यों रहना चाहते हो ?”
‘अपनी तरफ से मरने की सब कोशिश कर चुका ..लेकिन एक भी  बार किस्मत ने साथ नहीं दिया’
इस आखरी बात ने मुझे भीतर से हिला दिया |
मैंने अपने पास बचे थोड़े से ‘चखने’ को हाथ में लेकर उसे पुचकारा और वो सहमा-सहमा सा दुम हिलाता मेरे पास आ गया |
मेरे पास बचे थोड़े से 'चखने' को चट कर वो मेरे कदमो से चिपक गया |
“ये जाड़े से बेहाल होकर रो रहा था या भूख से ?”मैंने अपने आप से सवाल किया |
ना मेरे भीतर से कोई जवाब आया , ना उसकी तरफ से |
वो मेरे कदमो से सटा था जैसे मुझसे गर्मी उधार मांग रहा हो |
मैंने घूँट मारा और मारा मूझे अपने बेटे की याद आ गयी | जाड़े में सोते हुए उसकी कंपकपी और उसका मुझसे चिपट जाना | मै दूर होता तो वो माँ से चिपट जाता |
“तेरी माँ कहाँ गयी ?”
मैंने अपनी ऊनी शाल के छोर से पिल्ले को ढांपते हुए पुछा |
‘पता नहीं जब से आंख खोली अपने सिवा किसी को नही पाया’ उसने मेरे कदमो से और सटते हुए कहा |
इस दरमिया दो-एक बस गुजरी | चायवाला उठकर फिर दुबक रहा और मै अपने उस नये साथी के साथ बात में मशरूफ रहा आया |
“ देश की राजनीति के बारे में तुम क्या सोचते हो”
‘ऐसी वाहियात बातो के बारे में सोचने की मुझे फुसरत कहाँ मिलती है’
उसके इस जवाब पर मैंने उसे उसकी जात की गाली दी जिस पर वो मुस्कुरा दिया |
इस बातचीत में कब समय गुजर गया पता ही नही चला |
घड़ी देखी तो सालीवाड़ा बस का समय हो चुका था |
मेरे कदमो से सटे हुआ  और ऊनी चादर से लिपटे हुआ वो मुझमें  मेरे बेटे का अहसास जगा रहा था | उसकी 'कू-कू' और कंपकंपाना अब बंद हो चुका था | शायद उसे नींद लग चुकी थी | मैंने उसके खर्राटे सुनने की कोशिश की जो नहीं सुनाई दिये |
“अब इसके पास कोई घोड़ा थोड़े ही है जो उसे बेचकर सोयेगा” मैंने अपने आप को समझाया और अपने आप मुस्कुरा दिया |
गिलास में अब भी थोड़ी सी बची थी लेकिन मेरे पास इंतज़ार की भारी घड़ी को काटने के लिए अब बेहतर साथी मौजूद था इसलिए मैंने उस थोड़ी सी को अंत तक बचे रहने दिया |
खुद से सवाल-जवाब के इस सिलसिले बीचदूर से बस आते दिखी |
घड़ी के मुताबिक़ वो सालीवाड़ा बस ही थी |बस रुकी और मानो नीद में दुबके बस स्टेंड ने कुनमुना कर हल्की से करवट ली |
मैंने एहतियात से अपना ऊनी साल उसे ओढ़ाया ताकि उसकी नींद और गर्मी में खलल ना पड़े |
और चोर की तरह अपना बेग उठाक्रर दबे कदमो से बस की तरफ लपका |
मैंने बस में चढ़कर पलट कर देखा तो वो भी  'कू-कू' करते हुए बस की तरफ भागा आ रहा था |
बस चल दी थी |
 झाँककर खिड़की के  बाहर देखा तो वो भी बस के पीछे-पीछे अपने नन्हे मरियल कदमो से भाग रहा था |
“वो मुझे विदा करना चाहता था या मेरे साथ चलना ? वो मेरी मौजूदगी की गर्मी चाहता था या कुछ और ?”
मैंने अपने आप से पूछा |जवाब ना पाकर मैंने सीट पर सिर टिकाकर सोने की कोशिश की |
अधनींद में बहुत देर तक एक बच्चे के रोने जैसी आवाज़ मेरा पीछा करते रही |
आज भी जब घूँट मारता हूँ वो आवाज़ मुझे सुनाई देने लगती है |
फिर कभी सालीवाड़ा में दुबारा उससे मुलाक़ात नहीं हुई ||

 ||हनुमंत किशोर || 

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