सूक्ष्मकथा : फकीर औरअसर
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१) फकीर
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फकीर को गुदड़ी से उठाकर दुकानदारों ने चांदी के सिंहासन में कैद कर दिया |
फकीर के दरबार तक जाने वाले हर रास्ते पर उन्होंने इतने टोल टैक्स बेरियर बना दिए कि फकीर तक अब केवल मालदार आसामी ही पहुँच सकते थे | दुकानदारों के पलंग अब सोने के हो चुके थे |
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२)असर
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वो अंधेरी बेंच पर बैठा था |
सिगरेट के धुंए का छल्ला हवा में तैरा लेकिन ज़रा सी देर ही ठहरा |
उसी बीच कुछ चेहरे , कुछ आवाज़े उभरी और डूब गयीं |
लेकिन मुँह में धुयें की तरह ज़ेहन में उनकी कड़वाहट देर तक बनी रही |
इलायची के दानों ने मुंह की कडवाहट को बदल दिया था लेकिन ज़ेहन की कडवाहट बिस्तर पर भी बनी रही ||
3) सखा
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सखा बेचैन थे |
मेरे कान में फुसफुसाये...
' हे सखे इस बार सावधान रहना .. मामा ने इस बार मुझे घेरने की नयी जुगत की है'
"वो क्या ?" मैंने कान खड़े करके पूछा |
' इस बार वो मुझे क्रूर पहरेदारों से सज्जित कारागार में में नहीं अपितु महल के भीतर भोले-भाले भक्तो से घिरे सोने के पालने में क़ैद करेगा... और तो और खुद उसने मेरे नाम की कंठी पहन रखी होगी ..|'
सखा फुसफुसाये और गहरी सोच में डूब गये |||
४) अपराध
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"साहब उस रात गलती हो गयी थी.... मैंने आपा खो दिया और बीबी पर हाथ उठ गया "
मैंने कान पकड़ते हुए अपना जुर्म कबूल कर लिया|
मुझसे संतुष्ट नहीं दिखते हुए मुंसिफ ने सवाल दागा -
'लेकिन तुम ज़िम्मेदार अधिकारी होकर ऐसा कैसे कर गये ?'
" दरअसल वो रात को पार्षद की कोठी में कृष्ण पूजा में जाने के लिए लगातार जिद कर रही थी |"
'तो जाने देते यह तो उपासना की स्वतन्त्रता है...मतलब तुमने उसे रोककर एक और अपराध किया |' मुसिफ ने आँखे तरेर कर कहा |
"कैसे जाने देता साहब ?.... स्याले को ८ साल पहले उसी की होटल में लड़कियों का धंधा करते हुए रंगे हाथों पकड़ा था | . आज अनाप शनाप कमाकर हमारे पड़ोस में सबसे बड़ी कोठी बनाकर रहने लगा तो बड़ा धर्मात्मा हो गया ..स्याला ... |"
गाली भीतर चबा पाता तब तक मेरी आवाज तेज़ हो गयी थी |
मैंने गौर किया कि मुंसिफ के माथे पर बल पड़ गये थे |
शायद मैंने तीसरा अपराध भी कर दिया था ||||
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१) फकीर
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फकीर को गुदड़ी से उठाकर दुकानदारों ने चांदी के सिंहासन में कैद कर दिया |
फकीर के दरबार तक जाने वाले हर रास्ते पर उन्होंने इतने टोल टैक्स बेरियर बना दिए कि फकीर तक अब केवल मालदार आसामी ही पहुँच सकते थे | दुकानदारों के पलंग अब सोने के हो चुके थे |
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२)असर
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वो अंधेरी बेंच पर बैठा था |
सिगरेट के धुंए का छल्ला हवा में तैरा लेकिन ज़रा सी देर ही ठहरा |
उसी बीच कुछ चेहरे , कुछ आवाज़े उभरी और डूब गयीं |
लेकिन मुँह में धुयें की तरह ज़ेहन में उनकी कड़वाहट देर तक बनी रही |
इलायची के दानों ने मुंह की कडवाहट को बदल दिया था लेकिन ज़ेहन की कडवाहट बिस्तर पर भी बनी रही ||
3) सखा
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सखा बेचैन थे |
मेरे कान में फुसफुसाये...
' हे सखे इस बार सावधान रहना .. मामा ने इस बार मुझे घेरने की नयी जुगत की है'
"वो क्या ?" मैंने कान खड़े करके पूछा |
' इस बार वो मुझे क्रूर पहरेदारों से सज्जित कारागार में में नहीं अपितु महल के भीतर भोले-भाले भक्तो से घिरे सोने के पालने में क़ैद करेगा... और तो और खुद उसने मेरे नाम की कंठी पहन रखी होगी ..|'
सखा फुसफुसाये और गहरी सोच में डूब गये |||
४) अपराध
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"साहब उस रात गलती हो गयी थी.... मैंने आपा खो दिया और बीबी पर हाथ उठ गया "
मैंने कान पकड़ते हुए अपना जुर्म कबूल कर लिया|
मुझसे संतुष्ट नहीं दिखते हुए मुंसिफ ने सवाल दागा -
'लेकिन तुम ज़िम्मेदार अधिकारी होकर ऐसा कैसे कर गये ?'
" दरअसल वो रात को पार्षद की कोठी में कृष्ण पूजा में जाने के लिए लगातार जिद कर रही थी |"
'तो जाने देते यह तो उपासना की स्वतन्त्रता है...मतलब तुमने उसे रोककर एक और अपराध किया |' मुसिफ ने आँखे तरेर कर कहा |
"कैसे जाने देता साहब ?.... स्याले को ८ साल पहले उसी की होटल में लड़कियों का धंधा करते हुए रंगे हाथों पकड़ा था | . आज अनाप शनाप कमाकर हमारे पड़ोस में सबसे बड़ी कोठी बनाकर रहने लगा तो बड़ा धर्मात्मा हो गया ..स्याला ... |"
गाली भीतर चबा पाता तब तक मेरी आवाज तेज़ हो गयी थी |
मैंने गौर किया कि मुंसिफ के माथे पर बल पड़ गये थे |
शायद मैंने तीसरा अपराध भी कर दिया था ||||
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