Skip to main content

फकीर औरअसर//

सूक्ष्मकथा : फकीर औरअसर
*****************************************
१) फकीर 
_________________
फकीर को गुदड़ी से उठाकर दुकानदारों ने चांदी के सिंहासन में कैद कर दिया |
फकीर के दरबार तक जाने वाले हर रास्ते पर उन्होंने इतने टोल टैक्स बेरियर बना दिए कि फकीर तक अब केवल मालदार आसामी ही पहुँच सकते थे | दुकानदारों के पलंग अब सोने के हो चुके थे |
++++++++++++++++++++++

२)असर
______________
वो अंधेरी बेंच पर बैठा था |
सिगरेट के धुंए का छल्ला हवा में तैरा लेकिन ज़रा सी देर ही ठहरा |
उसी बीच कुछ चेहरे , कुछ आवाज़े उभरी और डूब गयीं |
लेकिन मुँह में धुयें की तरह ज़ेहन में उनकी कड़वाहट देर तक बनी रही |
इलायची के दानों ने मुंह की कडवाहट को बदल दिया था लेकिन ज़ेहन की कडवाहट बिस्तर पर भी बनी रही ||



3) सखा
______________
सखा बेचैन थे |
मेरे कान में फुसफुसाये...
' हे सखे इस बार सावधान रहना .. मामा ने इस बार मुझे घेरने की नयी जुगत की है'
"वो क्या ?" मैंने कान खड़े करके पूछा |
' इस बार वो मुझे क्रूर पहरेदारों से सज्जित कारागार में में नहीं अपितु महल के भीतर भोले-भाले भक्तो से घिरे सोने के पालने में क़ैद करेगा... और तो और खुद उसने मेरे नाम की कंठी पहन रखी होगी ..|'
सखा फुसफुसाये और गहरी सोच में डूब गये |||

४) अपराध
________________
"साहब उस रात गलती हो गयी थी.... मैंने आपा खो दिया और बीबी पर हाथ उठ गया "
मैंने कान पकड़ते हुए अपना जुर्म कबूल कर लिया|
मुझसे संतुष्ट नहीं दिखते हुए मुंसिफ ने सवाल दागा -
'लेकिन तुम ज़िम्मेदार अधिकारी होकर ऐसा कैसे कर गये ?'
" दरअसल वो रात को पार्षद की कोठी में कृष्ण पूजा में जाने के लिए लगातार जिद कर रही थी |"
'तो जाने देते यह तो उपासना की स्वतन्त्रता है...मतलब तुमने उसे रोककर एक और अपराध किया |' मुसिफ ने आँखे तरेर कर कहा |
"कैसे जाने देता साहब ?.... स्याले को ८ साल पहले उसी की होटल में लड़कियों का धंधा करते हुए रंगे हाथों पकड़ा था | . आज अनाप शनाप कमाकर हमारे पड़ोस में सबसे बड़ी कोठी बनाकर रहने लगा तो बड़ा धर्मात्मा हो गया ..स्याला ... |"
गाली भीतर चबा पाता तब तक मेरी आवाज तेज़ हो गयी थी |
मैंने गौर किया कि मुंसिफ के माथे पर बल पड़ गये थे |
शायद मैंने तीसरा अपराध भी कर दिया था ||||

Comments

Popular posts from this blog

सिल-बट्टा

कथा : सिल-बट्टा ... ++++++++++++++++++ दादी सास मरी तो उनका लकड़ी का सन्दूक पलंग के नीचे से बाहर निकाला गया | कभी पूरी हवेली उनकी तर्जनी पर नाचती थी | फिर वे एक कमरे तक सिमटती गयीं और फिर पलंग ही उनका संसार हो गया था | उन्होंने शरीर के जेवर उतारकर बहुओं में बाँट दिये थे | कभी बेटी-दामाद आते तो दादी पलंग के नीचे से सन्दूक निकालने को कहती और एक कपडे की गाँठ खोलकर नोट निकालती और आशीष देते हुए थमा देती  | उस गाँठ में वापस नोट कहाँ से आ जाते थे यह राज दादी सास के साथ ही .... दादी सास के संदूक को खोलकर नाती पोतों ने उसकी रहस्य भरी दुनिया में झाँका ..उनके कपड़े ..कपड़ों के नीचे कुछ देवी देवताओं की तस्वीर और उनके बीच एक बहुत पुराना लगभग गल चुका गमछा ... और सबसे नीचे .. सिल-बट्टा ...| सिल-बट्टा का निकलना था कि लगा दादी सास का भूत निकल आया हो | कहते है यह दादी सास की दादी सास के समय से था | नयी बहु आती तो इसकी पूजा करायी जाती | धोखे से पाँव लग जाता तो प्रणाम करने होते | दाल पीसनी हो या चटनी ...ये महाराज धों पोंछकर बिछाये जाते और फिर वैसे ही धो पोछकर दीवार के सहारे टिका दिये जाते | जब मिक्सी-ग्...

तहखाना और राजयोग

तहखाना इस तयखाने की जानकारी में सिर्फ साहब और उनके चार सिपहसलार को ही   हैं | छटवां सिर्फ   मैं हूँ | साहब   के इस   तहखाने   में ऐसे ऐसे   राज़ हैं कि बाहर आ   जायें तो   हंगामा हो   जाये | आप   पूछे इसके पहले मै आपको बता   दूँ   कि मै आपको   कुछ   बता नहीं सकता सिर्फ दिखा सकता   हूँ वो भी अपने उन   इशारों से जिन्हें   आप   पढने   की योग्यता   शायद   नहीं   रखते | दरअसल मुझे इस विशेष तहखाने तक पहुँचने के अवसर की    योग्यता   अपनी सिर्फ एक   जन्मजात अयोग्यता के   कारण हासिल   हो सकी है और वो है   मेरा   जन्मजात   गूंगा और अनपढ़ होना | ना बोल सकता   ना लिख सकता इसलिए कोई खतरा   ना   समझकर साहब ने तहखाने में होने वाली गप्त वार्ताओं के समय   अपनी और मंडली की   सेवा के लिए   मेरा   चयन   किया | बोतल , सोडा , चखना , सिगरेट और खाना   परोसने भर तक मुझे वहां   रहने   की ...

लप्रेक :टुरा और टुरी

टुरा और टुरी : लप्रेक ***************** १)पूर्वार्ध ^^^^^^^^ कहते है जमीन और आसमान सिर्फ मिलते हुए दिखते हैं ,हक़ीक़त में मिलते कभी नही । तो एक ऐसी ही जगह जहां ज़मीन और आसमान मिलते दिख रहे थे एक टुरी खड़ी थी । उसके जूड़े में फूल था । उसकी अँजुरी में फूल थे उसकी साँसों में फूल थे उसकी आँखों मे फूल थे वो उस तरफ देख रही थी जिस तरफ से एक टुरा आता दिख रहा था । दिख रहा था ...बस ..आ नही रहा था । टुरा अचानक दूसरी गली में मुड़ गया । इस स्टोर से उस स्टोर इस बिल्डिंग से उस बिल्डिंग उसकी जेब मे एक लंबी लिस्ट थी लिस्ट बड़ी मंहगी थी और वह बेहद जल्दी में था । टुरी खड़े खड़े ऊँघने लगी टुरा भागते भागते बहुत दूर निकल गया । २)उत्तरार्ध ^^^^^^^^^^^^ टुरा बड़ा होकर 'ही' बना । 'ही' बड़ा आदमी बना । टुरी बड़ी होकर 'शी' बनी । 'शी' लेखिका  बनी । 'शी'को अब भी विश्वास था कि ज़मीन और आसमान का मिलना स्वप्न नही सच है । सो उसने टिकट कटाया और मुम्बई जा पहुंची । 'ही' मिला जरूर लेकिन  लंबी गाड़ी ऊंचे बंगले और मोटे  बैंक बैलेंस के नीचे दबकर उसका चेहरा वीभत्स हो ...