सूक्ष्म कथा : फूल
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बड़ी देर भटकने के बाद वो फूल तक पहुंचा |
उसने उसके चारों तरफ घूमकर यकीन करना चाहा कि वो एक फूल ही था |
बड़ी हिम्मत कर उसने उसे छुआ और सूंघा भी |
आखिर में हारकर तसल्ली करने के लिए उसने गूगल में टाइप किया "फूल" और सर्च किया |
फूल के बारे में वो बड़ी देर तमाम बाते पढ़ते रहा..तमाम चित्र देखते रहा |
उधर फूल जब उब कर थक गया एक उसांस लेकर झड़ गया |
लघु कथा :गो सेवक
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वे मेरे मित्र हैं |
कपड़े का धंधा करते हैं |दुकान की सजावट देखकर लगता है धंधा फल-फूल रहा है
साथ में गो सेवक भी हैं | दुकान में गौमाता की मूर्ती रखते हैं जिसके सींग चांदी से मढ़े हैं और जिसके उदर में गो सेवा का चंदा जमा होता रहता है |
मै उनकी दुकान कुछ लेने नहीं उनकी मुस्कान देखने जाता हूँ | जो वे हर ग्राहक के दुकान की ओर रुख करते ही बिछा देते हैं |
आज शाम भी उनकी दुकान पर खड़ा उनकी मुस्कान का नजारा कर रहा था |जिसे बीच बीच में समेटकर भजन गुनगुनाते हुए वे गौ माता की मूर्ती को चमका रहे थे |
अचानक मैंने देखा कि उनकी अर्धचन्द्र मुस्कान तीखे त्रिशूल की त्योरी में बदल गयी |
मैंने उनकी नज़र का पीछा किया तो देखा तीन लोग कांच का दरवाज़ा ठेलकर अन्दर घुसे थे | तीनो के चेहरे और लिबास से लगता था कि वे मजदूर क्लास के थे | उन्होंने उनके चीकट पाँव देखे फिर दुकान का कीमती कालीन देखा और अपनी घूरती आँखों और कड़कती आवाज़ से उन्हें वहीँ रोक दिया |
'क्या चाहिये ?' वे गरजे
"कमीज देखनी है |"किसी तरह मजदूर महिला ने साहस कर उत्तर दिया |
उनके माथे का त्रिशूल और गहरा हो गया लेकिन ग्राहक को भगा सकने का साहस वे नही कर सके और हाथ के इशारे से दायें काउंटर पर जाने को कहा |
मिनट भर में उनकी सहन शक्ति जवाब दे गयी और यह सोचकर कि ऐसे फटीचर कस्टमर उनकी दुकान की सरासर तौहीन हैं, वे बेचैन हो गये |
उन्होंने काउंटर के नौकर को कपड़े समेटने और मजदूरों को दफा करने का इशारा किया |
अगले ही पल तीनो मजदूर दुकान के बाहर थे |
उनकी अर्ध चन्द्र मुस्कान लौट आयी थी |
भजन गुनगुनाते हुए वे गौ माता की मूर्ती की सेवा में लीन हो गये |
सूक्ष्म कथा : विडम्बना
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सुबह देखा गया
भगवान की दहलीज पर
एक बच्चे की लाश पड़ी थी |
बस्ती में जाने क्या हवा उड़ी कि दोपहर तक चोराहों पर बच्चे की तस्वीरे फूल माला के साथ टंग चुकी थी , जिनमे नीचे सुनहरे अक्षरों से लिखा था "धर्म की वेदी पर बाल बलिदानी" |
लेकिन अंतिम संस्कार के समय नहलाते हुए उसके अंगो के कुछ चिन्हों से जान पड़ा कि बच्चा उनके धर्म का नहीं था |
शाम तक हवा उल्टी बहने लगी और देखते -देखते चौराहे पर लगी तस्वीरों पर स्याही पोत दी गयी जिनके नीचे काले अक्षरों से लिख दिया गया "विधर्मी " |
उधर दहलीज के बाहर बैठा एक लड़का यह सब हैरानी से देख रहा था |
शायद उसे पता नही था कि यह उसकी अंतिम हैरानी थी !!
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बड़ी देर भटकने के बाद वो फूल तक पहुंचा |
उसने उसके चारों तरफ घूमकर यकीन करना चाहा कि वो एक फूल ही था |
बड़ी हिम्मत कर उसने उसे छुआ और सूंघा भी |
आखिर में हारकर तसल्ली करने के लिए उसने गूगल में टाइप किया "फूल" और सर्च किया |
फूल के बारे में वो बड़ी देर तमाम बाते पढ़ते रहा..तमाम चित्र देखते रहा |
उधर फूल जब उब कर थक गया एक उसांस लेकर झड़ गया |
लघु कथा :गो सेवक
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वे मेरे मित्र हैं |
कपड़े का धंधा करते हैं |दुकान की सजावट देखकर लगता है धंधा फल-फूल रहा है
साथ में गो सेवक भी हैं | दुकान में गौमाता की मूर्ती रखते हैं जिसके सींग चांदी से मढ़े हैं और जिसके उदर में गो सेवा का चंदा जमा होता रहता है |
मै उनकी दुकान कुछ लेने नहीं उनकी मुस्कान देखने जाता हूँ | जो वे हर ग्राहक के दुकान की ओर रुख करते ही बिछा देते हैं |
आज शाम भी उनकी दुकान पर खड़ा उनकी मुस्कान का नजारा कर रहा था |जिसे बीच बीच में समेटकर भजन गुनगुनाते हुए वे गौ माता की मूर्ती को चमका रहे थे |
अचानक मैंने देखा कि उनकी अर्धचन्द्र मुस्कान तीखे त्रिशूल की त्योरी में बदल गयी |
मैंने उनकी नज़र का पीछा किया तो देखा तीन लोग कांच का दरवाज़ा ठेलकर अन्दर घुसे थे | तीनो के चेहरे और लिबास से लगता था कि वे मजदूर क्लास के थे | उन्होंने उनके चीकट पाँव देखे फिर दुकान का कीमती कालीन देखा और अपनी घूरती आँखों और कड़कती आवाज़ से उन्हें वहीँ रोक दिया |
'क्या चाहिये ?' वे गरजे
"कमीज देखनी है |"किसी तरह मजदूर महिला ने साहस कर उत्तर दिया |
उनके माथे का त्रिशूल और गहरा हो गया लेकिन ग्राहक को भगा सकने का साहस वे नही कर सके और हाथ के इशारे से दायें काउंटर पर जाने को कहा |
मिनट भर में उनकी सहन शक्ति जवाब दे गयी और यह सोचकर कि ऐसे फटीचर कस्टमर उनकी दुकान की सरासर तौहीन हैं, वे बेचैन हो गये |
उन्होंने काउंटर के नौकर को कपड़े समेटने और मजदूरों को दफा करने का इशारा किया |
अगले ही पल तीनो मजदूर दुकान के बाहर थे |
उनकी अर्ध चन्द्र मुस्कान लौट आयी थी |
भजन गुनगुनाते हुए वे गौ माता की मूर्ती की सेवा में लीन हो गये |
सूक्ष्म कथा : विडम्बना
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सुबह देखा गया
भगवान की दहलीज पर
एक बच्चे की लाश पड़ी थी |
बस्ती में जाने क्या हवा उड़ी कि दोपहर तक चोराहों पर बच्चे की तस्वीरे फूल माला के साथ टंग चुकी थी , जिनमे नीचे सुनहरे अक्षरों से लिखा था "धर्म की वेदी पर बाल बलिदानी" |
लेकिन अंतिम संस्कार के समय नहलाते हुए उसके अंगो के कुछ चिन्हों से जान पड़ा कि बच्चा उनके धर्म का नहीं था |
शाम तक हवा उल्टी बहने लगी और देखते -देखते चौराहे पर लगी तस्वीरों पर स्याही पोत दी गयी जिनके नीचे काले अक्षरों से लिख दिया गया "विधर्मी " |
उधर दहलीज के बाहर बैठा एक लड़का यह सब हैरानी से देख रहा था |
शायद उसे पता नही था कि यह उसकी अंतिम हैरानी थी !!
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