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सुअर और सोना (pig and gold )

सुअर और सोना
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(A pig painted gold is still a pig ..robert jorden )
सृजन कलाकार संघ का शुक्रिया अदा करता हूँ कि उन्होंने मेरी कृति 'सुअर और सोना ' को प्रथम पुरूस्कार के लिए चयनित करते हुए मुझे सृजन सम्मान से सम्मानित किया |
कला तो जीवन की ऋणी होती है ,यदि मनीकान्त मेरे जीवन में नहीं आये होते तो शायद ही इसकी रचना हो पाती | रंग और रेखाएं भले कुछ और है लेकिन इसमें अक्स मनिकांत का ही है |
बात समझाने के लिए आपको शुरू से सुनाना होगा |
तो आज से १० साल पहले फाइन आर्ट की डिग्री लेकर में बेरोजगार बैठा था | स्कूलों में ड्राइंग मास्टर के लिए आवेदन दे रखे थे लेकिन या तो उनकी सेलरी कम थी या दूसरी शर्ते भी थे जैसे ड्राइंग सिखाने के अलावा ऑफिस का क्लर्कियल काम भी करना होगा |
मैंने तय किया कि अपनी ड्राइंग क्लास खोलूँगा और पत्र पत्रिकाओं के लिए स्केच करूँगा |
'तूलिका' नाम से ड्राइंग क्लास शुरू कर दी | स्कूल -स्कूल जाकर पम्पलेट बांटे |चित्रकला की स्पर्धा कराकर क्लास के लिए बच्चे जुटाए | बहन से थोड़ा कर्ज लिया और शहर में अपनी क्लास के फ्लेक्स लगवा दिए |
एक बच्ची थी रिद्धि, शहर के नामी वकील मनिकांत की बेटी | अच्छा सीख रही थी और उसमे हुनर भी था |
लेकिन उसका सिर्फ प्रवेश शुल्क जमा हुआ था पिछले तीन महीने से क्लास की फीस नहीं भरी गयी थी |
क्लास में चार बच्चे और थे जिनकी भी फीस नहीं आती थी | लेकिन ये गरीब होनहार बच्चे थे जिन्हें मैने बिना फीस के सिखाना तय किया था |
लेकिन रिद्धि तो अच्छे खासे घर से थी |
अभी कुछ दिन पहले उसके जन्म दिन के आमन्त्रण में गया था | सिर्फ केक ही २० पाउंड का रहा होगा और उसकी ड्रेस में मानो सच के सितारे जड़े थे |
मनीकान्त इस सम्पन्नता से मुझे कोई इर्ष्या नहीं हुई बस मैंने सोचा कि मेरी फीस तो आज के डी जे के खर्चे से भी आधी होगी ...फिर देने में क्या समस्या है ?
मैंने उन्हें अगले महीने रिमांड किया तो बोले "ले लीजियेगा कहीं भागे जा रहे हैं क्या ?"फिर कभी बोल देते "बस भिजवा रहा हूँ" लेकिन इस तरह चार से पांच , पांच से छ: माह हो गये |
एक दिन हारकर उनके बंगले 'कोहीनूर विला'जा पहुंचा |
इस बार उनकी आँखे सख्त हो गयीं लेकिन होंठ पर मुस्कराहट लाकर वे बोले "कैसी फीस .. कभी आपका भी काम पड़ेगा तो हम भी नहीं लेंगे ....अभी तो ये लीजिये " कहते हुए उन्होंने ड्रायफ्रूट की प्लेट की तरफ इशारा किया |
मै उठा और हाथ जोड़कर यह कहते हुए बाहर निकल आया कि कल से रिद्धि को क्लास ना भेंजे |
तीसरे दिन मुझे कानूनी कार्यवाही के लिए 'समन' यानी नोटिस मिला |
मै समझ गया यह मनीकान्त की ही हरकत है | उन्होंने मुझसे एक बार क्लास के पंजीयन और रिकार्ड के बारे में खोद-खोद कर पूछा था |
मैं गलत नहीं था 'समन' मिलने के बाद मैंने तय किया 'जो होगा ..निपटूंगा' |हाँ रिद्धि के लिए अफ़सोस जरुर हुआ था | उसके दोस्तों से मुझे मालूम हुआ कि वो क्लास छूट जाने को लेकर खूब दुखी थी और रोते हुए अपने डैड को उसने बुरा भी कहा था |
हफ्ते भर के भीतर ही सरकार ने नोट बंदी कर दी |
तीसरे दिन मनीकान्त की मेरून 'इनोवा' मेरी क्लास के सामने रुकी |
वे रिद्धि के साथ उतरकर बरामदे में आये |
एक लिफाफा मेरी तरफ बढाते हुए बोले 'रिद्धि ड्राइंग ही करना चाहती है ..आप दो साल तक की फीस एक साथ लीजिये'
मैंने लिफाफा खोलकर देखा तो अन्दर पुराने नोट थे |
मै कुछ कहता कि मनीकांत बोले " चार नोट फिर भी ज्यादा हैं ...अभी ८० का रेट है ...लेकिन आपको तो एक्सचेंज में पूरे मिलेगे ...अमीर ना होने का यही तो फायदा है "
बात खत्म कर वे मेरी तरफ देखकर शरारत से मुस्कुराये |
मैंने रिद्धि को अन्दर जाने का इशारा किया जहाँ बच्चे अभ्यास कर रहे थे |
मनीकांत मुड़कर जाने लगे तो मैंने कहा 'इसे लेते जाइये' और लिफाफा उनके आगे बढ़ा दिया |उस समय जाने कैसी शक्ति मेरे भीतर कौंधी थी कि मनीकांत लिफाफा लेकर फटी आँखों से ताकते रहे |
उसी रात मैंने अपनी इस कृति 'सुअर और सोना ' पर काम शुरू किया |
सोने के थाल में रखी गंदगी को ताकता हुआ ये सुअर ..सिर्फ सुअर नहीं है ..
इस कृति का बहुत सा आइडिया मुझे रीद्धि से भी मिला है |
वो सामने बैठी है ...उसके लिए भी प्लीज तालियाँ बजा दीजिये...
|| हनुमंत किशोर ||

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