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तीन लघु कथाये : हनुमंत किशोर

एनकाउंटर 
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गोल मेज कांफ्रेंस जारी थी ।सबके माथे पर चिंता की लकीरें खींची हुई थीं ।
'उसके पास से एक माचिस ,तीन किताब .दो कोरी नोटबुक ,एक पेन और चार नंबर बरामद हुये थे बस '
नीली वर्दी वाला साहब पसीना पोछते हुये बोला 
'लेकिन रात को व्ही.आई.पी. इलाके मे घूमने कोई कारण भी नहीं बताया स्याले ने '
हरी वर्दी ने ने मुट्ठी भींचकर कहा
'उसकी किताब मे लिखा है देश जरनल से बड़ा है । शक्ल और बातों से साफ है कि वो देश की तरह नहीं सोचता..था.. '
पीली वर्दी ने सख्त लहजे मे कहा
'लेकिन इतना पर्याप्त नहीं है उसे देश द्रोही सिद्ध करने के लिये' नीली वर्दी ने चिंता जाहिर की ।
'माचिस के अलावा कुछ भी ऐसा नहीं मिला जिससे वो कुछ कर सकता था ...हम क्या कहें अब ? ' एक साथ सारी वर्दियों ने भुनभुनाते हुये चीफ की तरफ़ आदेश के लिये देखा ।
चीफ का चेहरा तन चुका था ।
'यही कि आत्म रक्षा मे मुठभेड़ के दौरान मारा
गया '....चीफ ने टेबल पर मुक्का मारते हुये कांफ्रेंस बर्खास्त कर दी.....
दूसरे दिन सबसे बड़ी सुर्खी थी "खतरनाक देश द्रोही एनकाउंटर मे मारा गया ' ॥
॥हनुमंत किशोर ॥



अमन के ननिहाल वाले उधर रह गये..अमन के ददिहाल वाले इधर रह गये ।
बीच मे दरिया बहता रहा जो कभी कभी लाल हो जाता....
लोग कहते फिर दिल्ली और इस्लामाबाद मे तकरार हो गयी है ॥
टीवी और अखबार जब बारूदी गंध से सने होते हैं , वो तब भी अमृता की चोटी खींचने से और मोहन और जसप्रीत को प्यार भरी गाली देने से बाज नहीं आता ॥
अमन का परिवार भले ईद मे खुश होता हो अमन को मज़ा होली दीपावली मे ज्यादा आता है वजह सिर्फ इतनी कि इन मौकों पर उसे मस्ती करने के लिये दोस्त मिल जाते है ।
लेकिन इस दफे दरिया का पानी लाल हुआ तो आसमान भी लोहे के डैने वाली चीलों से भर गया । सरहद पार से गोलियाँ छूटने लगी...धमाके होने लगे ।
अमृता ,मोहन,जसप्रीत के परिवार की तरह उसे भी बस्ती से बाहर बने बंकर मे अपने परिवार के साथ पनाह लेनी पड़ी ।
अमन के लिये सबसे बड़ा दुख यह था कि वो अपने दोस्तों के साथ मैदान मे नहीं खेल सकता था ।
अमन के अम्मी-अब्बू की तरह वो भी दुआ करता , लेकिन उसकी दुआ मे दोस्तों के संग खेल मे शरीक होने की मिन्नत होती ।
आज अम्मी ने जब से बताया कि दिवाली है तब से अमन मासूस हो गया ।
उसे दिवाली की याद रह रह कर सताने लगी ।
तब कैसे आसमान मे आतिशबाजी देखकर वे मचल उठते थे और पटाखे के धमाके पर नाचने लगते ।
धमाके तो आज भी हो रहे थे लेकिन इन्हे सुनकर सबका दिल दहल उठता था ।
किसी तरह सोया तो तो उसने ख्वाब मे देखा कि सरहद पार दोनों तरफ़ से फरिश्ते आ जा रहे है जिनमे किसी के हाथ मे ईद की सेंवई है किसी के हाथ मे दिवाली की मिठाई और पटाखे....
अमन ने आवाज़ देकर अपने दोस्तों को मैदान मे जमा कर लिया है जहाँ वे आतिशबाजी का मज़ा लेंगे..
ख्वाब जारी था कि तभी जोर का धमाका हुआ..
अमन की अम्मी ने उसे जोर से चीख कर भींच लिया....
एक लम्बी सी साँस छोड़ते हुये अमन धीरे से बुदबुदाया...."फरिश्ते सिर्फ ख्वाबों मे आते है.."
सुबह अमन का शरीर तप रहा था...अम्मी और अब्बू ...को बडबडाना समझ नहीं आ रहा था....वो मुसल्सल बड़बड़ा रहा था.."फरिश्ते सिर्फ ख्वाब मे आते हैं....."
टोबा टेक सिंह का नाम तो आपने सुना है ना साहब ??
॥हनुमन्त किशोर ॥

रंगोली 
..............
रेनू आज ही आई थी ।
शाम से ही रंगोली बनाने लगी । रंगोली बनाते समय इस बार उसे दादी की टोका टाकी की याद आ रही थी ।
दादी कभी रंगोली नहीं बनाती थी ना ही रसोई मे उन्हे कभी खाना बनाते देखा ना ही कभी कोई काम साधते । लेकिन कोई भी काम उनकी टोका टाकी के बगैर हो जाये तो उसे अपशकुन समझा जाता । अब ना उन्हे ठीक से दिखता था ना ही वे देर तक बैठ सकती थीं लेकिन बोलने मे उनमे तब भी वैसी ही ताकत थी जब तब रही होगी जब वे अपनी ससुराल आई होंगी ।
दादी हर त्यौहार पर सबकी मौजूदगी चाहती थी । उसके लिये त्यौहार का मतलब था सबका एक साथ होना । जो नहीं आ पाता उसे फोन पर आशीष देती ।
रेनू पिछली दीपावली सेमेस्टर परीक्षा होने से नहीं आयी थी तब फोन पर ही उसने दादी की आवाज़ सुनी थी..चिरहुलानाथ रक्षा करें....आवाज़ भीगी थी जो अक्सर आँख भीग आने पर हो आती हैं ।
रेनू ने दादी का प्रिय लाल रंग फूल ने भरना शुरू किया और उसे पिछली के पिछली दीपावली याद आ गयी जब देहरी पर पूरे समय बैठकर रंगोली के बारे मे बतियाती रही थी ।बात ही उनकी दवा थी । वे कितनी भी बीमार हो यदि कोई उनसे पेट भर बतिया ले तो वे चंगी होने लगती थी । रंगोली से रसोई सब उनके बतियाने के बहाने थे जिसे लोग टोका-टाकी समझ लेते रेनू ने रंगोली की पत्तियाँ बनाते हुये अपने आप से कहा ।
रेनू ने नज़र उठाकर देहरी की तरफ़ देखा जहाँ दादी की लाठी अभी भी टिकी थी । दादी इसी लाठी के सहारे अंत मे रंगोली के की परिक्रमा करती रेनू को आशीष देती और देहरी पर जाकर बैठ जाती ।
रात बच्चे पटाखे चलाते तो अपनी प्यारी टोका टाकी फिर शुरू कर देती ।रंगीन आतिशबाजी के बीच दादी की झिड़की की फुलझड़ी का अपना ही अलग मज़ा था ।रेनू ने रंगोली फूल के ऊपर बैठी तितली मे रंग भरते हुये अपने आप से कहना जारी रखा ।
अचानक रेनू वो वाकया याद कर मुस्कुरा दी जब प्रसाद का लड्डू खा लेने पर पापा ने उन्हे झिड़क दिया था और तब दादी मुँह फुलाकर अपनी रजाई मे दुबक गयी थी ।लेकिन बच्चे उन्हे मनाकर पटाखे के समय उठा लाये ।एक फुलझड़ी भी उनके हाथ मे जलाकर थमायी गयी तब दादी अपने पुराने रंग मे लौटी और उनके टोकने की आवाज़ से पटाखो की आवाज़ भी सुरीली हो गयी थी ।
पटाखा यानी पटा और खा....रेनू संधि विच्छेद कर हँस दी ।
रंगोली बनाकर उसने एक नज़र देखा तो लगा फूल नहीं एक झुर्रीदार चेहरा बन गया है और तितली कुछ कुछ उसके जैसी है।
आँगन मे अंतिम बार यहीं ज़मीन पर दादी की देह धरी गयी थी ।
रेनू के अपनी गीली आँखे पोछी तो लाल रंग चेहरे पर छप गया ।
रात रेनू जब घूरे पर दिया रखकर लौटी तो दादी का उजास चौतरफ़ बिखरा दिखा ।
"घूरे पर दिया सबसे पहले रखा करो...असली पूजा वही हैं "...दादी दिया सजाते समय हमेशा टोकती थी
॥हनुमंत किशोर ॥

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