Skip to main content

दीन ईमान /सिक्का / बैंच वाला बूढ़ा

सूक्ष्म कथा : दीनईमान

+++++++++++++++++++++++

मई के सुलगते सूरज में मज़ार से लगे पेड़ की छाया भी मानो सुलग रही थी |

बगल की बिल्डिंग में उसका इंटरव्यू लंच के बाद था ... लेकिन सुबह से उसने इस छाया के नीचे डेरा जमा

रखा था और भीतर से निकल रहे उम्मीदवारों को टटोल रहा था |

पसीना पोछते हुए उसकी निगाह मज़ार के सामने बैठे फकीरों में से एक पर ठहर गयी ...हरे कुरते और सर

पर बंधे रुमाल में भी उसने उसे पहचान ही लिया |

" अरे ये स्याला तो हाई कोर्ट के मंदिर केसामने हर मंगलवार और शनिवार तिलक लगाकर चोला पहनकर

बैठता है ..आज शुक्रवार है तो चोला बदलकर यहाँ मजार पर ..... |"..सोचते हुए उसका मुंह हिकारत से टेढ़ा हो

गया |

उसने सर को हलका झटका दिया और बुदबुदाया... स्याले आदमी का आज कोई दीन ईमान ही नहीं बचा है |

इस बीच मोबाइल; वाईब्रेट हुआ | देखा तो घर से कॉल थी |

उधर से पापा ने हिदायत दी ..बेटा मज़ार में माथा टेक कर मन्नत मांग लेना |

वो जैसे नीद में ही हरकत में आ गया |

उसने फोन रखने के साथ ,,झट से रूमाल निकालकर माथे पे लपेटा ...

और नींद में ही दरगाह की तरफ तेज़ कदमो से चल पड़ा ||||||

कथा : सिक्का

__________________

कल भर्ती थी |

परसों भर्ती में शामिल होने दोस्तों के साथ आया था |जिनके साथ रिक्रूटमेंट बोर्ड के सामने के फुटपाथ

पर सिरहाने डिग्रियों वाला बस्ता रखकर रात गुजारी थी | दोस्त कल ही लौट गये थे लेकिन उसे पास

होने की उम्मीद थी सो रुक गया था |

गाँव छोटी लाइन की पैसेंजर जाती थी लेकिन इन्क्यारी से पता चला कि ट्रेक रिपेयरिंग होने से

पैसेंजर आज शाम ६ बजे की जगह रात १० बजे तक जायेगी | यानी ढाई-तीन घंटे बाद जब घर

पहुंचेगा यो सब सो रहे होंगे | और इस ख्याल भर से उसे भूख कचोटने लगी | सुबह से वो भूख

का मुकाबला यह सोचकर करता आया था कि रात सीधे घर पहुंचकर दबाकर खायेगा |

साथ लाये रूपये भर्ती वाले दिन ही ख़त्म हो गये था क्योंकि ताक़त बढ़ाने के लिए दो-तीन बार केले

और मुसम्मी का जूस पी डाला था | पैसेंजर के लिए अभी २ घंटे और बाकी थे सो खाने के जुगाड़

में स्टेशन के बाहर टहलते हुए बार-बार ज़ेब में हाथ डालकर रूपये गिन रहा था | एक प्लेट राजमा-

चावल के लिए १ सिक्का कम था |

हाथों ने जेब के सिक्कों को कसकर दबा रखा था, दिल एक सिक्का एक सिक्का गा रहा था और

आँखे एक सिक्का तलाश रही थीं |

अचानक उसकी आँखों के आगे स्ट्रीट लाईट की रौशनी में कुछ गोल सा चमका | उसी समय उसने

उपरवाले को शुक्रिया कहा और इसके पहले कि कोई दूसरा देख ले, तेज़ी से उस ओर लपका | उसने

सिक्के को उठाना ही चाहा था कि करेंट की तेज़ी से हाथ वहीँ रुक गया | वो बलगम का थूक था |

वो तेज़ी से सीधा हुआ और अपनी बेबकूफी पर हँस दिया |

हँसी से कुछ देर के लिए भूख का असर जाता रहा लेकिन असर लौटते ही सिक्का फिर नाचने

लगा |

“एक सिक्का किसी से भीख मांग लो” उसने अपने आप से कहा “लेकिन कैसे माँगा जाये ?” उसने

अपने आप से पूछा और जवाब ना पाकर , उसे पाकेटमारी का ख्याल भी आया लेकिन चाचा के

लडके की पिटाई का ख्याल कर वह इस ख्याल पर ज्यादा देर नही टिक सका |

सिक्के के लिए भटकती नज़र सामने सामान खरीद रहे आदमी पर ठहर गयी , जो बड़ी हडबडी में था

| उसी हड़बड़ी में उसके बटुए से एक सिक्का गिरा ...टन्न... और लुढ़क चला | आदमी ने टन्न की

आवाज़ पर नीचे देखा लेकिन कुछ ना पाकर तेज़ी से आगे बढ़ गया |

उतनी ही तेज़ी से ‘वो’ भी उधर बढ़ा जिधर सिक्का लुढ़का था .. चोर निगाहों से इधर उधर ताका और

किसी को अपनी और ना ताकते पाकर जमीन पर झुक गया | सिक्का नाली की तरफ लुढ़का था |

नाली सूखी थी | उसने एक बार फिर भगवान को शुक्रिया कहा |

उसके हाथ तेज़ी से नाली में सिक्का ढूंढने लगे |

नाली में सिक्का नहीं उसका राजमा-चावल गिरा था |||

कथा : बेंच वाला बूढ़ा

++++++++++++++++++++

मै तो पार्क में चौकी दार हूँ साहब .. मुझे क्या मालूम बूढ़ा कहाँ गया ?

वो तो टीवी-मोबाइल- अखबार सब जगह फोटू देखा तो पता चला बूढ़ा कोई साधारण आदमी नहीं था |

लास्ट टाइम इसी बेंच पर देखा था | पिछले कई सालों से बस आकर इसी बेंच पर बैठा रहता |फिर एक

लड़की आती उसके साथ पूरे समय बात करता खेलता उसे ज़ेब से निकालकर टाफियाँ देता ...| पार्क

बंद करते समय कहना पड़ता बाबू जी समय हो गया |

फिर वो लड़की अचानक से गायब हो गयी | पुलिस ने बूढ़े को भी गुमशुदगी की रिपोर्ट पर थाने बुलाया..

लेकिन पूछताछ में बस एक ही रट ‘परी थी परी लोक चली गयी ...’| एक बार मैंने पूछा तो बोला वापस

ला सकता तो ले आता |

फिर रोज आकर गुमसुम बेंच पर बैठा रहता ... पार्क बंद होने पर साथ लायी टाफ़ी-चाकलेट हम लोगों

के बाँटकर चला जाता |

लास्ट टाइम जब वो बेंच पर बैठा था तो एक लड़की पार्क में खेल रही थी मां के साथ | लड़की शायद

वही थी ..या नहीं भी हो सकती ...अब साहब मुझे रतौंधी है ..शाम को उतना साफ़ नहीं दिखता |

अचानक मैंने लड़की की माँ का हल्ला सूना | भीड़ जमा हो गयी थी | लड़की की माँ बदहवास चिल्ला रही

थी ... लम्पट-कमीने मेरे हटते ही तू नीच हरक़त पर उतर आया...मासूम को चाकलेट से फुसलायेगा

..गोद में बिठाकर..गुदुदुदी करेगा ....... बगैरा वगैरा | देखते देखते भीड़ जमा हो गयी | उन्ही में से किसी

ने पुलिस बुला दी और ...|

घरवालों का कहना है की दूसरे दिन जमानत पर छूटकर बूढ़ा घर नहीं गया | यह कहकर सीधे पार्क को

गया की उसका कुछ कीमती सामान वहां गिर गया है ... और तब से घर नहीं लौटा |

अब मैं क्या बताऊँ साहब .. मुझे तो रतौंधी है ... हाँ गिरा तो कुछ जरुर था ...लेकिन क्या.??

कह नहीं सकता ||||

Comments

Popular posts from this blog

तहखाना और राजयोग

तहखाना इस तयखाने की जानकारी में सिर्फ साहब और उनके चार सिपहसलार को ही   हैं | छटवां सिर्फ   मैं हूँ | साहब   के इस   तहखाने   में ऐसे ऐसे   राज़ हैं कि बाहर आ   जायें तो   हंगामा हो   जाये | आप   पूछे इसके पहले मै आपको बता   दूँ   कि मै आपको   कुछ   बता नहीं सकता सिर्फ दिखा सकता   हूँ वो भी अपने उन   इशारों से जिन्हें   आप   पढने   की योग्यता   शायद   नहीं   रखते | दरअसल मुझे इस विशेष तहखाने तक पहुँचने के अवसर की    योग्यता   अपनी सिर्फ एक   जन्मजात अयोग्यता के   कारण हासिल   हो सकी है और वो है   मेरा   जन्मजात   गूंगा और अनपढ़ होना | ना बोल सकता   ना लिख सकता इसलिए कोई खतरा   ना   समझकर साहब ने तहखाने में होने वाली गप्त वार्ताओं के समय   अपनी और मंडली की   सेवा के लिए   मेरा   चयन   किया | बोतल , सोडा , चखना , सिगरेट और खाना   परोसने भर तक मुझे वहां   रहने   की ...

कथा :राखी और कवच

कथा : राखी +++++++++++++++++ आज के दिन जब दीदी की कलाई पर राखी बांधता हूँ और उससे रक्षा का वचन लेता हूँ तो लोग कहते हैं कि मै गलत परम्परा डाल रहा हूँ..| मै कहता हूँ नही ..बस परम्परा को सही कर रहा हूँ | मेरी बात समझने के लिए आपको मेरे बचपन में जाना होगा | हम पांच थे .. माँ ,बाबू, दीदी मैं और सिम्मो | कस्बे में घर के बाहरी कमरे में ही हमारी प्रेस की दूकान थी .. माँ पड़ोस से कपड़े लाती और बाबू मुंह में बीड़ी दबाये कपड़ो पर कोयले वाला प्रेस फेरते | बीड़ी की लत ने बाबू को जवानी में ही इतना बेदम कर दिया कि अब वे सिर्फ प्रेस में कोयला भर पाते और प्रेस फेरने का काम दीदी के जिम्मे आ गया | दीदी दिन भर काली चाय पीती और प्रेस करती | हाँ मुझसे और सिम्मो से जरुर कहती दूध पीया करो ..कमज़ोर दिखते हो | मेरे कालेज पहुँचते पहुँचते जब बाबू सिर्फ दवा के भरोसे रह गये तब दीदी ने बाबू की जगह ले ली | दीदी अब प्रेस के साथ हमारी पढ़ाई लिखाई के बारे में भी पूछती | जबरिया जेब में नोट डालकर सर पर हाथ फेरते हुए कहती चिंता मत कर खूब पढ़ | मेरा कालेज खत्म भी नहीं हुआ था.. कि सिम्मो कस्बे के ऑटो वाले के साथ भाग गयी | मैने अपन...

दुम और जंगल

सूक्ष्म कथा : दुम और जंगल;  ************************** ********* १) दुम +++++++ मै दम लाने के चक्कर में दुम काट दिया करता था| ' लेकिन हमें हिलती हुई दुम पसंद है' मेरी रचनाओ के पढ़ने के बाद कड़वा सा मुंह बनाते हुए सम्पादक महोदय में प्रकाशक की ओर ठेल दिया | प्रकाशक पान की पीक के साथ उन पर कुछ थूकने जा ही रहे थे कि मैं उन्हें समेटकर तेज़ी से उठा | उतनी ही तेज़ी से "वे" अन्दर आये और अपने झोले से लम्बी दुमो को निकालकर टेबल पर उनके सामने फैलाकर बैठ गये | कुछ सालों बाद "वे" सम्पादक की कुर्सी पर विराजमान थे ||| २)जंगल +++++++++ उनके शहर जाना हुआ | वे बोले ' चलिये आज जंगल पिकनिक कर आते हैं |' घंटो कार से भटकने के बाद शहर के मुख्यमार्ग से हटकर झाड़ियों की आड़ थी जिसे शायद आसपास केगाँव वालों ने दिव्यनिपटान के लिए बचा कर रखा होगा | हम वहां अपने साथ ले जाये गये टिफिन खाली करके सेल्फी लेकर लौट आये | रात उनके घर डिनर पर जाना हुआ| तीन लोंगो के लिए ६ बेडरूम के उस घर में दरवाजे खिड़की फलोरिंग बेड ड्रेसिंग डाइनिंग काउच सोफा सब का सब शानदार वुडन क्राफ्ट था | जिसकी खासियत वे ग...