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undo

सूक्ष्म कथा : undo 
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अगले सब्जेक्ट को अन्दर बुलाने के पहले मैंने उसकी केस हिस्ट्री पर नज़र डाली | परिवार मित्र शिक्षक सबसे कटा हुआ ..हमेशा गुमसुम सामाजिक क्रिया प्रतिक्रिया से दूर | उसे इस आधार पर मंद बुद्धि मान लिया गया था कि वो कम्प्यूटर पर दिन रात शतरंज खेलने के बाद भी पहला लेवल पार नहीं कर सका था | हैरानी की बात थे कि जिस दिन से उसने पहला गेम चालू किया था वही आज तक चालू था .. अनिर्णीत |
वो अन्दर आया और अपने चश्मे के भीतर से मुझे ऐसे झाँका जैसे मै काउंसलर नहीं शतरंज की उल्टी हुई बिसात था |
“ क्या हम शतरंज खेल सकते है ?” मैंने उसे सहज करने के लिये पूछा |
जवाब में उसने कहा कि वो केवल कम्प्यूटर के साथ खेलना पसंद करता है क्योंकि उसमे undo करके वो अपनी गलती सुधार सकता है लेकिन लोग तो सिर्फ जीतने के लिए खेलते है ..वे उसे कभी undo नहीं करने देते .. |
“ लेकिन तुम एक ही गेम पिछले कई सालों से क्यों खेल रहे हो ... तुम उसे खतम कर सकते हो |” अब मैंने स्वयम को सहज करते हुए पूछा
“मगर मै तो खेलने के लिए खेलता हूँ ...इसलिए जिस तरह कम्प्यूटर मेरी गलती माफ़ कर देता है ..मै भी कम्प्यूटर की गलती माफ़ कर देता हूँ ... मै कम्प्यूटर की तरफ से भी : undo कर देता हूँ ...” वो चश्मे के पीछे से मुस्कुराया |
“लेकिन बेटा ..इस तरह तो कभी खेल खत्म ही नहीं होगा ...तुम्हे चाहिए कि ..|” मै काउंसलिंग शुरू ही करने जा रहा था कि उसने एक ख़ास तरह से गर्दन टेढ़ी की और तिरछी निगाहों से देखते हुए मेरी बात काटते हुए धीमे से बोला...
" अंकल ... खेल खत्म करने के लिए नहीं खेलने के लिए खेलना चाहिए |"
पहली बार मुझे लगा मै एक सब्जेक्ट हूँ और किसी नन्हे से काउंसलर के आगे बैठा हूँ |||||||

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