Skip to main content

undo

सूक्ष्म कथा : undo 
++++++++++++++++++++++
अगले सब्जेक्ट को अन्दर बुलाने के पहले मैंने उसकी केस हिस्ट्री पर नज़र डाली | परिवार मित्र शिक्षक सबसे कटा हुआ ..हमेशा गुमसुम सामाजिक क्रिया प्रतिक्रिया से दूर | उसे इस आधार पर मंद बुद्धि मान लिया गया था कि वो कम्प्यूटर पर दिन रात शतरंज खेलने के बाद भी पहला लेवल पार नहीं कर सका था | हैरानी की बात थे कि जिस दिन से उसने पहला गेम चालू किया था वही आज तक चालू था .. अनिर्णीत |
वो अन्दर आया और अपने चश्मे के भीतर से मुझे ऐसे झाँका जैसे मै काउंसलर नहीं शतरंज की उल्टी हुई बिसात था |
“ क्या हम शतरंज खेल सकते है ?” मैंने उसे सहज करने के लिये पूछा |
जवाब में उसने कहा कि वो केवल कम्प्यूटर के साथ खेलना पसंद करता है क्योंकि उसमे undo करके वो अपनी गलती सुधार सकता है लेकिन लोग तो सिर्फ जीतने के लिए खेलते है ..वे उसे कभी undo नहीं करने देते .. |
“ लेकिन तुम एक ही गेम पिछले कई सालों से क्यों खेल रहे हो ... तुम उसे खतम कर सकते हो |” अब मैंने स्वयम को सहज करते हुए पूछा
“मगर मै तो खेलने के लिए खेलता हूँ ...इसलिए जिस तरह कम्प्यूटर मेरी गलती माफ़ कर देता है ..मै भी कम्प्यूटर की गलती माफ़ कर देता हूँ ... मै कम्प्यूटर की तरफ से भी : undo कर देता हूँ ...” वो चश्मे के पीछे से मुस्कुराया |
“लेकिन बेटा ..इस तरह तो कभी खेल खत्म ही नहीं होगा ...तुम्हे चाहिए कि ..|” मै काउंसलिंग शुरू ही करने जा रहा था कि उसने एक ख़ास तरह से गर्दन टेढ़ी की और तिरछी निगाहों से देखते हुए मेरी बात काटते हुए धीमे से बोला...
" अंकल ... खेल खत्म करने के लिए नहीं खेलने के लिए खेलना चाहिए |"
पहली बार मुझे लगा मै एक सब्जेक्ट हूँ और किसी नन्हे से काउंसलर के आगे बैठा हूँ |||||||

Comments

Popular posts from this blog

तहखाना और राजयोग

तहखाना इस तयखाने की जानकारी में सिर्फ साहब और उनके चार सिपहसलार को ही   हैं | छटवां सिर्फ   मैं हूँ | साहब   के इस   तहखाने   में ऐसे ऐसे   राज़ हैं कि बाहर आ   जायें तो   हंगामा हो   जाये | आप   पूछे इसके पहले मै आपको बता   दूँ   कि मै आपको   कुछ   बता नहीं सकता सिर्फ दिखा सकता   हूँ वो भी अपने उन   इशारों से जिन्हें   आप   पढने   की योग्यता   शायद   नहीं   रखते | दरअसल मुझे इस विशेष तहखाने तक पहुँचने के अवसर की    योग्यता   अपनी सिर्फ एक   जन्मजात अयोग्यता के   कारण हासिल   हो सकी है और वो है   मेरा   जन्मजात   गूंगा और अनपढ़ होना | ना बोल सकता   ना लिख सकता इसलिए कोई खतरा   ना   समझकर साहब ने तहखाने में होने वाली गप्त वार्ताओं के समय   अपनी और मंडली की   सेवा के लिए   मेरा   चयन   किया | बोतल , सोडा , चखना , सिगरेट और खाना   परोसने भर तक मुझे वहां   रहने   की ...

ठूंठ

सूक्ष्म कथा : ठूंठ ********************************************************************************************************** केफेटेरिया के बगल से ढलान थी | जहाँ दोनों तरफ ऊँचे फूल पत्तियों से लदे फदे     हँसते खिलखिलाते पेड़ो की कतार थी | उसी कतार में एक ठूंठ था ...हरे भरों के बीच एक विषम संख्या | लेकिन शाम के वक्त ये ठूंठ हरा भरा हो जाता जब हज़ारो की संख्या में तोते उसकी सूखी फैली बांहों पर बैठ जाते | तोते ठूंठ का सारा नंगापन ढक लेते और ठूंठ झूठ मूठ ही सही पल भर के लिये भूल जाता कि वह अब फलफूलदार नहीं रहा | उस क्षण ठूंठ कभी   किसी दूल्हे सा इतराता   तो कभी उस माँ सा हुलस उठता जिसके बच्चे परदेश से लौट आये हों | एक दोपहर ढलान से उतरते हुये देखा ठूंठ पर कुल्हाड़े और आरे चल रहे थे उनकी आवाजों के बीच कुछ घुटी हुई सिसकियाँ सुनायी दी | वे ठूंठ की थीं या तोतों की कह नहीं सकता |   (चित्र गूगल साभार )

जाड़े की उस रात

जाड़े की उस रात +++++++++++++++ सालीवाड़ा में वो जाड़े की एक रात थी | यहाँ से जबलपुर जाने वाली गाडी साढ़े बारह पर थी |जहाँ से बनारस के लिए मेरी ट्रेन सुबह चार बजे थी |   सालीवाड़ा  का बीमार और बदबूदार बस स्टाप चिथड़ी रजाइयों और कथरियों में घुटने मोड़ कर घुसा यहाँ वहां दुबका पड़ा था |  चाय-सिगरेट के टपरे पर एक पीला बल्ब दिलासा देते हुए जल रहा था जिसके नीचे बैठा में अपनी बस के इंतज़ार में था | जाड़े में शरीर काम करना भले बंद कर दे दिल काम   करना बंद नहीं करता और कमबख्त  यादों को जाड़ा नहीं लगता वे वैसी ही हरारत से हमारे भीतर मचलती रहती हैं | तो परियोजना का काम पूरे जोर पर था और मैं अपने घर से सात सौ किलोमीटर दूर भीमकाय मशीनों और मरियल मजदूरों के बीच पिछले तीन हफ्तों से मोबाइल पर वीडियो चैट करके जाड़े में गर्मी पैदा करने की नाकाम कोशिश जारी रखे हुए था |   सरकार किसी भी हालात में उपचुनाव में जीत पक्की करनी चाहते थी  इसलिए ऊपर से दवाब बना हुआ था,जिसके चलते मै घर जाने का कोई रिस्क नहीं ले रहा था | इस परियोजना पर ही हमारी कम्पनी की साख निर्भर थी और कम्पनी ...