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नशा ( drug)

सूक्ष्म कथा : नशा 
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छ्द्म्मा ने आज जबरन राजू को नहला दिया था और वो जब तक चूल्हे के आगे दांत किटकिटाकर गर्म होता, छ्द्म्मा ने डालडे में गरम गरम पूड़ियाँ छानी और उसकी बाँह खीचते हुए मंदिर की तरफ चल दी |
मंदिर के आगे बैठे भिखारियों को राजू के हाथ से पूड़ी परोसवाने लगी तो भिखारियों ने पहले पूड़ी को फिर राजू के कपड़ो को और फिर छ्द्म्मा की साड़ी को देखा और फिर अपने कटोरे पर उचटी निगाह डालकर सामने सड़क की ओर देखने लगे ... जब कोई कुछ नहीं बोला तो छ्द्म्मा ही बोल उठी “आज लड़के का जन्म दिन है .... भगवान से मनाओ कि बड़ा आदमी बने” .. .. सिर्फ एक बुढ़िया ने जवाब में एक हाथ उठाया और एक कुबड़े ने अधमरी आवाज में ‘जय हो’ कहा ...
लेकिन उसकी अधमरी आवाज ने छ्द्म्मा को मानो ख़ुशी से फुला दिया और वो राजू को लगभग घसीटते हुए अन्दर जाने वाली लाईन में लग गयी |
राजू से हाथ जुड़वाने में ज़रा देर क्या लगी कि पुजारी जोर से चिल्ला उठा "इतना ही समय लगाना है तो अपने लिए अलग से मंदिर बना लो " ..सुनना था कि छ्द्म्मा हड़बड़ी में जो मांगने आयी थी भूल बैठी और लपककर बाहर भागी ...
बाहर निकली तो देखा कि बड़ी से गाड़ी से एक लड़का उतरकर पैसा और मिठाई बाँटने लगा और सारे भिखारी उसके चौगर्द इस तरह मंडराने लगे जैसे दीप के चौगर्द बारिश के पतिंगे ..
छ्द्म्मा ने देखा उसकी बाँटी पूड़ियाँ धूल में गिरी थी और एक कुत्ता उन्हें सूंघ रहा था |
छ्द्म्मा का नशा रफू हो चला था और वो राजू के पीछे घसीटते हुए लौट रही थी ||||  

on fase book 26/8/2014

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