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blood donation (रक्त दान )

सूक्ष्म कथा : रक्त दान 
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ठाकुर साहब ने आई सी यू में आँख खोली तो सामने ठकुराइन टिमटिमायी |
बगल में खड़े तीनो सपूत झिलमिलाये |
ठाकुर साहब ने आँखे वापस बंद की और फ्लेश बेक शुरू हो गया |
तालाब किनारे की चरनोई जमीन से बंशी कोल को बेदखल करने के लिए उनके लठैत हवा में लट्ठ लहरा रहे हैं कि एक लट्ठ बंशी के कपार में बजा और ख़ून का फव्वारा फूट पड़ा | उधर कोहराम मचा और इधर फौजदारी से बचने के लिए ठाकुर साहब उलटे पाँव भागे | रात छिपकर ससुराल जाते हुए अंधे कुएं में जा गिरे ..और फिर इसके आगे एकदम अँधेरा |
ठकुराइन ने तलवे सहलाये तो दुबारा आँख खोली |
“ भगवान् की किरपा रही ...बाल्टी भर खून बह गया फिर भी सुहाग सलामत है ...समय पर खून मिल गया ... ..नहीं तो हम आज बिना सिन्दूर के हो गए होते ..” ठकुराइन पल्ला मुँह में डालकर सुबुक रही थी |
“खून ... किसने दिया ..?” ठाकुर साहब ने आँखों में चमक भरकर बगल खड़े सपूतों को देखा |
“ बंशी के लड़के सुरिज ने ... बंशी को खून की जरूरत रही .. इधर सुरिज खून दिया ..उधर बंशी चल बसा ...| वही खून तुम्हें लग गया ... तुम्हारे तीनो सपूत तो खबर मिलने पर सुबह आये हैं |” ठकुराइन सुबके जा रही थी |
और ठाकुर साहब के आगे पुन: भरी रौशनी में अँधेरा छाता जा रहा था |||

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