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‘छंगा’ v/s दीपावली

‘छंगा’ v/s दीपावली
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माँ बाप ने क्या नाम दिया पता नहीं | ऊपर वाले ने छ: उँगलियाँ दे दी तो दुनिया ने उसे नाम दे दिया ‘छंगा’|
आठ नम्बर प्लेटफार्म के बाहर ‘बाबा भोजनालय ’ में बरतन मांजता |बदले में मिलता दो टाइम का भोजन और सोने के लिए टेबल | भोर के ४ बजे से वो होटल से लगे ‘सुलभ शौचालय’ के सामने प्लास्टिक का डब्बा लेकर लाइन में लग जाता | ये लाइन एक नम्बर प्लेटफार्म वाले दादा दरबार के आगे शाम को लगने वाली लाइन से भी लम्बी होती | यानी घंटे भर में भी ‘हल्के होने’ के लिए नम्बर लग जाये तो समझिये ऊपर वाले ने आपकी सुन ली |
कोई चिल्लर देने में हुज्जत करता है तो ठेकेदार का एक ही डायलाग होता कि इस देश में खाना मुफ्त मिलता है लेकिन ‘पाखाना’ के दाम लगते हैं | इसी लाइन में जैसे ही छंगा नम्बर आता है वो चिल्लाकर अपने ग्राहक को आवाज लगाता जो उसके हाथ से डब्बा लेकर अन्दर घुस जाता | छंगा को अपना नम्बर छोड़ने के एवज में २ रूपये मिलते ,जिसका आधा ठेकेदार का कमीशन होता | साथ ही ‘चौकी’ के स्टाफ के लिए फ्री सर्विस भी देनी होती |
हालाकि खुद छंगा के लिये रेल की पटरियाँ ही निपटान का एकमेव स्थान थी | होली, दीवाली में जब प्लेटफार्म मुसाफिरों से ठसाठस होता तो छंगा भी अपना ओवर टाइम बढ़ा देता है ताकि ठाठ बाट से त्यौहार मना सके |
ठाठ बाट से त्यौहार मनाने का मतलब था रात के बर्तन निपटा कर दो हाफ प्लेट करी , दो हाफ प्लेट चावल ,आठ रोटियों और एक ‘अद्धी’ के साथ कचरे वाली कबरी औरत के संग फुटपाथ पर गाते हुये खाना खाना और गाते गाते वहीँ लुढ़क जाना |
लेकिन इस दीपावली कबरी अपने ठीहे पर नहीं मिली | छंगा ने देर तक कबरी का इंतज़ार किया | हारकर ‘अद्धी’ पीते हुये अपने हिस्से का खाना खाने लगा | खाते हुये उसने अकेले गाने की कोशिश भी की लेकिन उसे रुलाई छूट गयी |
रात तीसरे पहर फुटपाथ पर छंगा बेसुध पड़ा था और उसके बगल से बची हुई रोटियाँ और चिकन करी को एक कुत्ता खा रहा था |
हर दीपावली की तरह इस बार भी आसमान आतिशबाजी से भरा था और शहर रौशनी से |

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