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सूक्ष्म कथा : गायिका का आत्म कथ्य 
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लोंगो की खुसर फुसर , दबी चर्चाओं से तंग आकर मै अम्मा से बोली कि अब से गाना बजाना मुझसे नहीं होगा |
तब मेरा सिर सहलाते हुये अम्मा ने अपनी राम कहानी सुनायी...
“..पगली जब मै भी कोठे पर गाना सीखती थी तो लोग मुझे जमुनिया बुलाते थे और तबलची को नसीरा | जब शादी ब्याह में गाने लगी तो मै जमना हो गयी और वो नासिर |और जब हम ‘भारत महोत्सव’ से लौटे तो मै जमुना बाई हो चुकी थी और वो उस्ताद नासिर खां | तब मुझे भी लगा था कि मर्दों की जमात में औरत हमेशा ही ‘बाई’ रहेगी क्योंकि ‘उस्त्ताद’ होने के लिये मर्द होना ज़रूरी है |
थोड़ी तसल्ली इस बात की हुई कि जो लोग मेरे बिन ब्याही माँ होने पर शहर के हर रहीस से मेरा नाम जोड़कर चटखारे लेते थे वही सलाम करने लगे |मेरे सम्मान में मुझे सुनहरी गोट जड़ा सर्टिफिकेट दिया गया कि मुसम्मात जमुना बाई हमेशा बलन्द किरदार और मयार की औरत रहीं | आज भी उन सुनहरे हर्फ़ को देखती हूँ तो हँस पड़ती हूँ कि मै तो सदा से जो थी वही थी लेकिन मेरी बलन्दी ने लोंगो की नज़र बदल दी थी | कामयाबी जितना हमको बदलती है उससे ज्यादा हमारे देखने वालो को बदल देती है |
पगली आज तुझे लेकर जो लोग किस्से बना रहे हैं कल तेरी शोहरत के आगे अपना थूका चाटते नज़र आयेंगे|”
बात खत्म करते हुये अम्मा ने मुँह में भरी सारी पान की पीक पीकदान में उलट दी ..गोया वो पीकदान ना हुआ अफवाह उड़ाने वालो का खुला हुआ मुँह हो गया ||||

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