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possible // impossible

सूक्ष्म कथा : सम्भव असम्भव
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आचार्य की जीवनी का अंतिम अध्याय लिखा जाना था |
उस अंतिम साक्षात्कार में आचार्य ने अपनी ग्रीवा तानकर अपनी उपलब्धियों का कुछ यूं बखान किया ...
“ मैंने कई असंभव कार्य संभव कर दिखाये ..जैसे शब्दों को मूसल बनाकर विपक्षियों को कूट कूटकर विचूर्ण कर दिया ... आलोचना की एक फूंक मारी और आसमान को सौ योजन ऊपर खिसका दिया ...मेरे एक इशारे पर नदिया पर्वत पर जा चढ़ी... मैंने उंगलियों के फंदे में वायु को बंदी बना लिया ...मैं चाँदनी को चादर की तरह लपेटकर सितारों से छुपा छुपी खेला किया ....|”
एक अल्प विराम के बाद आचार्य ने उच्छवास के साथ कहा ..
“पर मै स्वर्गवासी पत्नी की शंका का समाधान ना कर सका जो अंत तक मानती रही कि मेरी प्रेम कविताओं की प्रेरणा मेरी शोध छात्रा है |”
...और दीवार पर टंगे चित्र को निहारते हुये गाव तकिये पर निढाल हो गये |||

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चैरिटी @सुई मुई


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वे गहने बनवाकर तुड़वाकर बोर हो गयीं |
वे साड़ी-बिंदी-मेचिंग कार बदलकर बदलकर बोर हो गयीं |
वे बी सी खेलकर और फोटो खिचवा खिचवाकर बोर हो गयीं |
वे जिम-योग-स्पा-पार्लर जाकर बोर हो गयीं |
वे डाग शो-फ्लावर शो-कुकिंग शो करके बोर हो गयीं |
वे पार्टी- हाउजी-पिकनिक करके बोर हो गयीं |
वे श्री श्री – बाबा – बापू से बोर हो गयीं |
वे क्रिकेट – सिनेमा- सीरियल से बोर हो गयीं |
अब फिर ...क्या करें ? क्या करें? क्या करें ?
तो सबने तय किया कुछ चेरिटी की जाये यानी देश दुनिया की सेवा की जाये ...
तो सबने चंदा किया और एक सेलिब्रिटी को बतौर चीफ गेस्ट बुक किया | हाल और केटरिंग का खर्चा काटकर जो बचा उसमे चेरिटी के लिए सामान खरीदा गया |अंत में जरूरतमंद की तलाश पूरी हुई |
दूसरे दिन सिटी पेज पर बड़ी सी तस्वीर छपी थी जिसमे एक बुढ़िया को देने के लिए दर्जनों सहबाइन ने मुस्कुराते हुये दोनों हाथों से एक सुई उठा रखी थी |
इधर वे दिन भर फोन पर एक दूसरे से बधाईयाँ बटोरती रहीं ...
उधर सुई में डालने के लिए, बुढ़िया दिन भर धागे की चेरिटी की बाट जोहती रही |||||

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