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hunger and religion


रूपक :भूख और धर्म
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योगिराज शिव अपने परिवार संग हिमालय में तपश्चर्या में लीन थे | सभी प्राणियों में सद्भाव और परस्पर प्रेम था | पुण्य और धर्म की जय थी |
किन्तु तराई के निवासियों द्वारा उर्जा के अंधाधुंध उपभोग से कारित जलवायु परिवर्तन ने हिमालय में भयानक आकाल निर्मित कर दिया |
वनस्पतियाँ सूख गयी | पशु पक्षी पलायन कर गये | आहार के लिए तीनो लोक में त्राहि त्राहि मच गयी |
एक दिन भूख से विक्षिप्त शिव का सर्प उनके गले से उतरकर ,भूख से शक्तिहीन पड़े गणेश के चूहे पर झपटा और उसे निगल गया | यह देखकर कार्तिकेय का क्षुधान्ध मोर भी साँप को खाने से स्वयम को रोक ना सका | भूख से तड़पते पार्वती के शेर से भी यह देख रहा ना गया और वो मोर को चबा गया |
अपने प्रिय जीवों का यह हश्र और परस्पर द्वन्द देख माँ भवानी शोक विह्वल हो उठी |
शिव की समधि भंग हुयी तो उन्होंने सांत्वना देकर उन्हें समझाया.. “देवी भूख का समाधान ही प्राणी का प्रथम धर्म है | पृथ्वी पर धर्म की रक्षा करने के लिये पहले सभी प्राणियों के पेट भरने होगे | ”
“कितु ..”. पार्वती ने टोकना चाहा |
‘किन्तु क्या देवी ..? भूख प्रकृति प्रदत्त है और आकाल मनुष्य निर्मित ...हमें यह संदेश उन तक पहुचाना होगा’ ..
कहकर शिव चिंतन लीन हो गये और माँ भवानी रसोई की चिंता में |||
( पंच तन्त्र के एक श्लोक से प्रेरित// चित्र साभार गूगल )

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