सूक्ष्म कथा : रुलाइयां
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४ माले घर के और
७ माले दफ्तर के | ११ माले चढ़ते-उतरते , उसे
कभी इतनी फुर्सत ना मिली अपनी रुलाइयों के साथ थोड़ा वक्त गुज़ार सके |
मौत आयी तो गिड़गिड़ा
उठा कि कुछ वक्त दो कि मै हलक में फसी रुलाइयों
को निकाल लूँ |
मौत भी चुतर हसीना
, हँसकर बोली “ठीक है वक्त दिया ...पर याद रखना पहली
हिचकी आने के साथ सब खत्म |”
रुलाई बाहर आती कि
हिचकी आ गयी और इसी के साथं भीतर फसी हुई रुलाइयां की मुक्ति का मार्ग सदा के लिए बंद
हो गया |
मै जब मातम पुर्सी
को पहुँचा तो कमरा लोबान की तीखी गंध से भरा
था |
मै कोने वाली कुर्सी
पर बैठा था कि मैंने देखा कि लाश से कुछ रुलाइयां निकली और धीरे धीरे मेरी और सरकने
लगी और देखते देखते मुझसे लिपट गयी |
मैंने एक एक को अलगाते
हुये कहा कि वे मुझे माफ़ करे मै कोई रुदाली नहीं हूँ |
हाँ कमरे से बाहर
निकलते हुये मैंने उन्हें वचन दिया था कि उनकी बात आप तक ज़रुर पहुचाऊंगा |
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