सूक्ष्म कथा : २ अक्टूबर
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२ अक्टूबर की रात थी गांधी मार्ग से गुजरते हुये दारुण कराह के साथ ‘हे राम’ सुनायी दिया |
देखा तो काउंटर पर हज़ार के नोट में विराजमान गांधी जी के ऊपर दारु की बोतल रखी थी |
वे बोतल से तनिक सरकने को कह रहे थे ताकि साँस ले सके |
“ दुश्मन से रहम की उम्मीद ...तुमने तो मुझे निषिद्ध घोषित किया था ” बोतल ने मुस्कुराते हुये कहा |
‘मैंने तो यह भी कहा था देश मत बाँटो ..पर उन्होंने बाँटा ...गाँवों को बर्बाद मत करो ..पर उन्होंने किया... उन्होंने मेरी कौन सी बात मानी..|मै तुम्हे नापसंद करूता हूँ लेकिन दुकानदार ..मेरी शक्ल देखे बगैर तुम्हे देता ही नहीं..” एक लम्बी कराह के साथ गांधी बोले |
“ तुम जिस समाज में रहते थे उसे जान नहीं पाये …ये जिनकी पूजा करता है उन्हें फ्रेम में जड़कर टांग देता है और जिन्हें गाली देता है उन्हें मुह और कलेजे से लगाये फिरता है ..” बोतल ने एक अगड़ाई लेते हुये कहा |
‘हे राम’ के साथ निकलती कराह को बीच में छोड़कर मै आगे बढ़ गया ....रास्ते में एक विचित्र प्राणी दिखायी दिया जिसके बोलने और खाने के मुँह अलग अलग थे |
उसके माथे पर किसी ने लिख दिया था .. “हिन्दुतान”..|||
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२ अक्टूबर की रात थी गांधी मार्ग से गुजरते हुये दारुण कराह के साथ ‘हे राम’ सुनायी दिया |
देखा तो काउंटर पर हज़ार के नोट में विराजमान गांधी जी के ऊपर दारु की बोतल रखी थी |
वे बोतल से तनिक सरकने को कह रहे थे ताकि साँस ले सके |
“ दुश्मन से रहम की उम्मीद ...तुमने तो मुझे निषिद्ध घोषित किया था ” बोतल ने मुस्कुराते हुये कहा |
‘मैंने तो यह भी कहा था देश मत बाँटो ..पर उन्होंने बाँटा ...गाँवों को बर्बाद मत करो ..पर उन्होंने किया... उन्होंने मेरी कौन सी बात मानी..|मै तुम्हे नापसंद करूता हूँ लेकिन दुकानदार ..मेरी शक्ल देखे बगैर तुम्हे देता ही नहीं..” एक लम्बी कराह के साथ गांधी बोले |
“ तुम जिस समाज में रहते थे उसे जान नहीं पाये …ये जिनकी पूजा करता है उन्हें फ्रेम में जड़कर टांग देता है और जिन्हें गाली देता है उन्हें मुह और कलेजे से लगाये फिरता है ..” बोतल ने एक अगड़ाई लेते हुये कहा |
‘हे राम’ के साथ निकलती कराह को बीच में छोड़कर मै आगे बढ़ गया ....रास्ते में एक विचित्र प्राणी दिखायी दिया जिसके बोलने और खाने के मुँह अलग अलग थे |
उसके माथे पर किसी ने लिख दिया था .. “हिन्दुतान”..|||
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