Skip to main content

प्रियतम

प्रियतम
************
उस दोपहर कोने वाली टेबल से वह मुँह फेर कर उठ गयी |
अज़ाब क्या होता है ? यह उस दिन ही जाना था |
शाम को जली बत्तियां , रात बुझने को हो आयी लेकिन एक तूफ़ान की गिरफ्त में वो इस गली से उस गली गुजरता रहा |
लेकिन आधी रात आते आते उसे लगने लगा कि दिल का दर्द नीचे पेट की तरफ उतर रहा है |देर रात रेलवे के ढाबे के सामने जब वो पहुँचा तो उसे लगा कि वो सिमट कर सिर्फ पेट रह गया है |
ढाबे की पानियल दाल में डुबोकर जब चौथी और आखरी रोटी का अंतिम निवाला उसने मिर्च के टुकड़े के साथ हलक से नीचे सरकाया तो महसूस किया कि पेट का दर्द गायब हो चुका है किन्तु दिल का दर्द फिर उठने लगा है |
इस बार दर्द उठने पर वो हलके से मुस्कुराया | अब वो दर्द को ख़ुशी ख़ुशी झेल सकता था |
उसने अपनी ज़ेब से कागज़ निकाला और जहाँ जहाँ ‘प्रिय ’ लिखा था वहाँ काटकर ‘रोटी’ लिख दिया |

Comments

Popular posts from this blog

ठूंठ

सूक्ष्म कथा : ठूंठ ********************************************************************************************************** केफेटेरिया के बगल से ढलान थी | जहाँ दोनों तरफ ऊँचे फूल पत्तियों से लदे फदे     हँसते खिलखिलाते पेड़ो की कतार थी | उसी कतार में एक ठूंठ था ...हरे भरों के बीच एक विषम संख्या | लेकिन शाम के वक्त ये ठूंठ हरा भरा हो जाता जब हज़ारो की संख्या में तोते उसकी सूखी फैली बांहों पर बैठ जाते | तोते ठूंठ का सारा नंगापन ढक लेते और ठूंठ झूठ मूठ ही सही पल भर के लिये भूल जाता कि वह अब फलफूलदार नहीं रहा | उस क्षण ठूंठ कभी   किसी दूल्हे सा इतराता   तो कभी उस माँ सा हुलस उठता जिसके बच्चे परदेश से लौट आये हों | एक दोपहर ढलान से उतरते हुये देखा ठूंठ पर कुल्हाड़े और आरे चल रहे थे उनकी आवाजों के बीच कुछ घुटी हुई सिसकियाँ सुनायी दी | वे ठूंठ की थीं या तोतों की कह नहीं सकता |   (चित्र गूगल साभार )

तहखाना और राजयोग

तहखाना इस तयखाने की जानकारी में सिर्फ साहब और उनके चार सिपहसलार को ही   हैं | छटवां सिर्फ   मैं हूँ | साहब   के इस   तहखाने   में ऐसे ऐसे   राज़ हैं कि बाहर आ   जायें तो   हंगामा हो   जाये | आप   पूछे इसके पहले मै आपको बता   दूँ   कि मै आपको   कुछ   बता नहीं सकता सिर्फ दिखा सकता   हूँ वो भी अपने उन   इशारों से जिन्हें   आप   पढने   की योग्यता   शायद   नहीं   रखते | दरअसल मुझे इस विशेष तहखाने तक पहुँचने के अवसर की    योग्यता   अपनी सिर्फ एक   जन्मजात अयोग्यता के   कारण हासिल   हो सकी है और वो है   मेरा   जन्मजात   गूंगा और अनपढ़ होना | ना बोल सकता   ना लिख सकता इसलिए कोई खतरा   ना   समझकर साहब ने तहखाने में होने वाली गप्त वार्ताओं के समय   अपनी और मंडली की   सेवा के लिए   मेरा   चयन   किया | बोतल , सोडा , चखना , सिगरेट और खाना   परोसने भर तक मुझे वहां   रहने   की ...

सट्टे पे सट्टा

सट्टे पे सट्टा :सूक्ष्म कथायें ************************************************************************************************* (सट्टा १ :पपलू ) __________________ तीन पत्ती पर पब में एल ई डी के आगे हुजूम लगा था | ... “क्या लगता है.. अगली बाल पे छक्का पड़ेगा ....?” “नहीं ...” “लगी एक एक बियर की” “ओके डन ...” ...........३ घंटे बाद ..... सडक पर एक पोस्टर को जूते से कुचलते हुए वे दोनों बडबडा रहे थे .. “स्याला नशे का नाश कर दिया ...खेल से गद्दारी करता है ..” | ************************** ************************** (सट्टा २ :किंग ) ___________________ शाम फोन पर .. ‘मेंगो का रेट बोलो’ “तीन का पांच”.. ‘ओरेंज ?’ “४ का ९” ‘तीन पेटी मेंगो...’ “ओके एमाउंट ब्लू हेवन में” .............रात दस बजे ...... फोन पर लड़खड़ाती आवाज आती है.. “..एमाउंट आधा करो टाइगर भाई श्याल्ल्ला खिलाड़ी बिक गया है...ऐसे में धंधा कैसे होयेगा .. ..श्याल्ल्ल्ला बेईमान” ‘कुमार साहब ..एमाउंट तो बंट गया,, सॉरी अपने धंधे में कोई रीप्ले नहीं चलता ’ और झटके से काल कट जाती है ||   ...