सूक्ष्म कथा : चक्की
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“देखो तो ज़रा, गेंहूँ के साथ बिचारा घुन भी पिसा जा रहा है...”
मैंने पिसनवारी को टोका |
‘ गेंहूँ के साथ घुन का पिसना कोई नयी बात नहीं है |’
आँखों पर पट्टी बांधते हुये पिसनवारी बोली और चक्की की रफ्तार बढ़ा दी |
घुन को नज़रअंदाज़ करते हुये मै भी आटा गूँथने लगा |
सिलसिला यूँ ही चलता रहा और कुछ दिनों में मैंने पाया कि अब गेहूँ के साथ घुन नहीं बल्कि घुन के साथ गेंहूँ पिस रहा था |
और अंत में देखता क्या हूँ कि पिसने को घुन ही घुन बचा था |
यहाँ पहुचकर चक्की की घरघराहट घुन का हाहाकार बन चुकी थी और उधर पिसनवारी ने अब कानो में भी रुई ठूँस ली थी |
महाशय,
मैंने पूरी ईमानदारी से घुन पर मर्शिया लिखा और सिर के ऊपर चादर तानकर सो गया ||
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“देखो तो ज़रा, गेंहूँ के साथ बिचारा घुन भी पिसा जा रहा है...”
मैंने पिसनवारी को टोका |
‘ गेंहूँ के साथ घुन का पिसना कोई नयी बात नहीं है |’
आँखों पर पट्टी बांधते हुये पिसनवारी बोली और चक्की की रफ्तार बढ़ा दी |
घुन को नज़रअंदाज़ करते हुये मै भी आटा गूँथने लगा |
सिलसिला यूँ ही चलता रहा और कुछ दिनों में मैंने पाया कि अब गेहूँ के साथ घुन नहीं बल्कि घुन के साथ गेंहूँ पिस रहा था |
और अंत में देखता क्या हूँ कि पिसने को घुन ही घुन बचा था |
यहाँ पहुचकर चक्की की घरघराहट घुन का हाहाकार बन चुकी थी और उधर पिसनवारी ने अब कानो में भी रुई ठूँस ली थी |
महाशय,
मैंने पूरी ईमानदारी से घुन पर मर्शिया लिखा और सिर के ऊपर चादर तानकर सो गया ||

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