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.१५ अगस्त :चिल्लर ख्याल

 १५ अगस्त :चिल्लर ख्याल  

लड्डू बंट रहे थे ..मै भी लाइन में लग गया ...मेरे हिस्से में टेढ़ा लड्डू आया ...मैंने कहा कि भाई मुझे बदलकर सीधा लड्डू दो ...उसने पलटकर कहा अब आज़ादी ही टेढ़ी मिली है तो लड्डू कहाँ से सीधा  मिलेगा .??..
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जैसे ही आज़ादी की घोषणा हुई सफ़ेद कबूतर आज़ाद कर दिये  गये .. मेरे सोचने वाली बात यह थी की कि यदि उन्हें आज़ाद करना ही था तो पकड़ा ही क्यों गया ?
और यह भी कि आज़ादी तो काले और भूरे लोंगो को मिली थी फिर आज़ाद सिर्फ सफ़ेद क्यों किये गये ?
नहीं मै रंगभेद की बात नहीं कर रहा मै तो सिर्फ यह पूछ रहा हूँ कि हम कब सफ़ेद की ग्रन्थि से आज़ाद होंगे ?
अंत तक मै यह समझने की कोशिश करता रहा कि आज़ाद कौन हुआ ...देश  या कबूतर ??
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मैंने सपना देखा कि नये कानून के हिसाब से बेईमान , मिलावट खोर , अंधविश्वास के कारोबारी ,जातिवादी और साम्प्रदायिक व्यक्ति सार्वजानिक समारोहों में झंडा नहीं फहरा सकेगे ...और सपने में  पाया कि अधिकाँश  समारोह  रद्द करने पड़ गये ...
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जैसे पापियों के लिये गंगा स्नान होता है ... यानी  गंगा में डुबकी मारने के बाद वो दूनी ताक़त से पाप कर्म में जुट जाता है ...वैसे ही देश  के दुश्मनों के लिये झंडा वंदन होता है... झंडा वंदन उनके एक्सपायरी लायसेंस भी रिन्यू कर देता है
आज़ादी के पेड़ पर फल लगे |  बराबर बराबर बंटवारा हुआ यानी जश्न उन्होंने अपने  पास रख लिया ..ज़िम्मेदारी हमें दे दी |
हम आज भी पंजीरी भूंज रहे है और ‘वे’ उसे खाने के साथ साथ उसमे लोट भी रहे हैं ...


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