उसने रद्दी
बाज़ार से दो चार किताबें खरीदी..
फिर एक लाइन इधर
से दूसरी उधर से मार कर एक नयी किताब टीप दी |उस किताब को अपने नाम से पेंटेंट कराया और मुम्बईया हीरोइन से उसका ब्लर्ब लिखवाकर, धाँसू कवर के साथ मार्केट में लांच किया |
और मीडिया में मेनेजमेंट गुरु के नाम से स्थापित हुआ |
फिर ‘मुक्ति’ के बाज़ार में नयी संभावनायें पाकर, उसमे उसी किताब को दूसरे नाम से हालीवुड की हीरोइन से ब्लर्ब लिखाकर लांच किया |
हम उसे इन दिनों ‘स्प्रीचुअल गुरु’ के नाम से पूजते हैं |||
बचपन में डाकुओ के चुंगल फंस गया तो उन्होंने मुक्ति के नाम पर फिरौती मांगी और पाकर मुक्त कर दिया |
जवानी में ‘घंटाल जी’ के चुंगल में फंस गया तो उन्होंने मुक्ति के नाम पर श्रद्धा मांगी ,फिर अंध श्रद्धा मांगी और फिर दान दक्षिणा के साथ श्रद्धा मांगी |
उनके चुंगल में धोखे से क्या फंसा आज तक रिहा ना हो सका |
डाकू इन दिनों सलाखों के पीछे है मगर ‘घंटाल’ जी का सिहासन ऊँचा उठता जा रहा है |
उनका सिंहासन श्रद्धालुओं के ऊपर टिका है |
प्रलाप :
बाज़ार के युग में गुरु वही है जो अंधे को आइना और गंजे को कंघी बेच दे वो भी मनचाहे दामो पर ...और एक बार नहीं हर बार बेच दे जब तक लेनेवाला टे ना बोल जाये ...|
गुरु तभी तक जीवित हैं जब तक चेले जीवित हैं ...चेले वो हवा है जिन्हें गुरु उनकी औकात अनुसार नाना छिद्रों से निकालता है ...
वो समाज कितना पाखंडी होगा जो गरु पूर्णिमा मनाता हो लेकिन “गुरूजी” को चपरासी से कम पगार देता हो |
जिस देश में गुरुओ की बाढ़ आ जाये समझो उसका बेडागर्क हो गया है या होने वाला है ...
( सर्व शंका निवारण के लिये घोषित है कि इसका आपके गुरु से कोई लेना देना नहीं है )


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