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नन्हा सटोरिया

नन्हा सटोरिया
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रात के अंतिम पहर सोमू पगरा लांघकर घुसा और खाट में चुपके से दुबक गया |
रात भर परेशान स्टेशन , बड़ा मंदिर, नरोदा ब्रिज जाने कहाँ कहाँ घूमता रहा था |
कभी ख्याल आया कि रेल की पटरी पर सो जाये ...कभी पुल से छलांग मार दे ..
... लेकिन हर बार बाबू का चेहरा याद कर रुक गया ..|
वो सोया रहता था तभी बाबू ठेला लेकर निकल जाते ,लेकिन आज तबियत भारी लगने से बाबू लेट निकले और उसी समय वो भी स्कूल के लिए निकला |
‘सोमू’ ... बाबू आवाज़ देकर अंदर को पलटे और मुठ्ठी भींच कर लौटे |
“ अच्छी सी शर्ट- पेंट खरीद लेना ....ऐसे कपडो में तेरा मजाक बनता होगा |”
बाबू ने अपनी मुठ्ठी उसकी हथेली में खोलते हुए कहा |
सोमू ने महसूस किया कि बाबू के हाथ के पसीना से नोट गीले हो गये थे |
बाबू ठेला लेकर बढ़े तो सोमू ने देखा उनकी पतलून पर पीछे थिगड़े लगे हुये थे |
रास्ते भर वो थिगड़े सोमू की आँखों में नाचते रहे |
रास्ते में रंगीला पान भन्डार दिखा तो सोमू को याद आया कि परसों जित्तू ने यहाँ रूपये डबल किये थे |
“तो यदि ये नोट भी डबल हो जायें तो बाबू के भी थिगड़े हट जायेंगे” सोमू को जुगत दिखी |
सोमू स्कूल ना जाकर जीत्तू के घर की ओर मुड़ गया | और लौटा तो सारे नोट जित्तू की बतायी क्रिकेट टीम पर लगा दिये |
सब कुछ ठीक चल ही रहा था कि आखरी ओवर में तीन खिलाड़ी चलते बने और हवा महल देखते देखेते मिटटी में मिल गया |
खाट पर आँखे मीचे सोमू एक ही बात सोच रहा था कि सुबह बाबू के पूछने पर क्या जवाब देगा |
और रह रह कर बाबू का चेहरा घूम जाता ..जिसमे नये नये थिगड़े लटकते जा रहे थे..|||
 

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