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सूक्ष्म संस्मरण

सूक्ष्म संस्मरण
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सुबह खबर आयी कि हमारे मित्र सुकुल जी दुबारा बाप बन गये हैं | आज के समय में दुबारा बाप बनने का जोखिम कोई वीर ही उठा सकता है | सो हम मियाँ बीबी ने तय किया कि सुकुल भईया और सुकुलाइन भौजी को को इस पराक्रम पर हस्पताल जाकर बधाई दी जाये और नन्हें मेहमान से मुलाक़ात भी की जाये |
रास्ते में तय हुआ कि ‘बूके’ यानी पुष्प गुच्छ ले लिया जाये |
सो गुलाब... का ‘बूके’ पसंद किया गया |
मुझे हैरानी तब हुई जब दुकानदार ने गुलाब के ‘बुके’ पर सेंट की शीशी उडेल दी |
‘सर इसके बगैर खुशबू नहीं आती’...मेरे टोकने पर दुकानदार ने कहा ....
‘हाय रब्बा अब गुलाब भी महकने के लिए नकली सेंट की मेहरबानी पर है’ ...मैने सोचा |
तभी ट्यूबलाईट जली कि गुलाब के बागीचों में कोई तितली या भौरा क्यों नहीं नज़र आता ...ये ससुरे सिर्फ दिखने के गुलाब के ...महकने के नहीं ...
हमने हाई ब्रीड जो तैयार की है उसमे सिर्फ आकार बढ़ा है लेकिन गुण नदारद हुये है ...चाहे फूल हो या सब्जी या आदमी ही क्यों ना हो ?
रास्ते भर उस गुलाब की नकली खुशबू से मेरा सर चकराता रहा ...
यही ‘आधे असली आधे नकली गुलाब’ हमने मुस्कुराकर ‘जच्चा और बच्चा’ के बगल में रख दिये |
जच्चा ने उन्हें सूंघा और शुक्रिया कहा ....
हमें भी लगा अब नकली खुशबू ही सम्बन्ध बचा सकती है ....असली अब हम लायें भी कहाँ से ????
बस एक अफ़सोस बच्चे के लिये रह गया कि वो असली खुशबू शायद ही जान पाये |||||

( पेंटिंग कैली साभार गूगल )                                                                                      
 

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