( पहला पाट :रात
के दूसरे पहर )
जंगल के बीचोबीच
बनी झोपड़ी के दरवाजे पर जोर की ठकठक हुई |
भीतर बाड़े की मुर्गी
फटफटा उठी |
बुढ़िया ने आँख खोली
तो देखा बुड्डा निढाल लेटा था |
सो आप ही लुंगरा
समेट कर उठी और बाहर आई |
टार्च की तेज रौशनी
चेहरे पर पड़ी तो आँख मिचमिचा गयी |
“वे लोग इधर दिखे हैं दो चार दिनों से...” एक आवाज़ कड़की
‘कोई नहीं दिखा सरकार ....’
टार्च की रौशनी ने अंदर चक्कर काटा और कोने में दुबकी मुर्गी ठहर गयी |
“ वे लोग दिखे तो तुरंत खबर करना .... अच्छा इनाम मिलेगा ..” दूसरी आवाज़ ज़रा मुलायम थी |
‘ हओ....पर सरकार लडकी का कुछ पता चला ..’ बुढ़िया ने हिम्मत कर पूछा |
“...अंतिम बार दादा लोगों के साथ दिखी थी ...मिलेगी तो
बतायेंगे...”
और कंधे की बन्दूक
को ठीक करते हुए.. जाती हुई आकृतियाँ मुर्गी की फडफडाहट के साथ अँधेरे में गायब हो
गयीं ...||
(दूसरा पाट : रात
का अंतिम पहर )
पश्चिम में शुकवा उग आया था | पर जंगल
गहरी नींद में था |
बुड्डे की नींद उचटी
हुई थी | देखा तो बुढ़िया बगल में निढाल लेटी थी |
दरवाजे पर ठकठक की
आवाज हुई तो गमछा कमर में लपेट कर बाहर आया |
“ काका ... क्या खबर है ?” टार्च की रौशनी के पीछे से कमांडर ने पूछा
‘कुछ नहीं माई बाप ....’
“ कोई कुछ पूछे तो कुछ नही बताना ... हम जीते तो जंगल तुम्हारा ....’
कहते हुए टार्च की
रौशनी अंदर झोपड़ी का जायजा लेने लगी और कोने में दुबके मुर्गी के चूजों पर ठहर गयी
|
‘माई बाप ...लड़की
का कुछ पता चला ..’ बुड्डे ने हिम्मत कर पूछा
“ अंतिम बार उन लोंगो के साथ दिखी थी ... मिली तो पहुँचा देंगे..”
कहते हुए उनके कमांडर
ने एक नोट बुड्डे के हाथ में रखा और कंधे की
बंदूकों को ठीक करते हुए वे आकृतियाँ चूजों की चिचियाहट के साथ तेज़ी से अँधेरे में गायब हो गयीं |||
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