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बाबा की कंठी

सूक्ष्म कथा :
बाबा की कंठी 

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नये साहब आये और आफिस क्या ..शहर में शोर मच गया कि ईमानदार साहब आया है |
साहब ने मुझसे आते ही गंगाजल छिड़कवाया और ऐलान किया कि ‘बिना लिये’ हर फाइल निपटायी जायेगी |
साहब ने अपने ऊपर बाबा की बड़ी सी फोटो टांगी |टेबल पर बाबा की बड़ी सी फोटो लगायी |
क्लाइंट आता तो वे फाइल को बाबा के चरणों से छुआकर कहते ‘सब बाबा का आशीर्वाद है’ |
साहब कोई ‘सेवा’ नहीं लेते लेकिन जब क्लाइंट चक्कर लगा कर थक जाता तो धीरे से सपरिवार बाबा के दर्शन की इच्छा जाहिर कर देते |
परिवार में ६ लोग थे और साहब इतने सुकुमार थे कि फर्स्ट ए.सी. से नीचे का टिकट स्वीकार नही करते |
महीने में चार से छ फेरा साहब का टारगेट था |
यात्रा के पहले साहब बीमार घोषित हो जाते और जब मै टिकट केंसिल कराकर पूरे ९८०० सौ रूपये हाथ में धर देता तो स्वस्थ हो जाते |
‘किसी से कहना मत’ कहते हुये,साहब १०० रूपये ‘बाबा का प्रसाद’ कहकर लौटा देते |
चपरासी रहते हुए कभी २० रूपये से ज्यादा का ‘प्रसाद’ नहीं मिला था |
सो मैंने भी कुछ दिनों बाद बाबा के नाम की कंठी पहन ली |

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