सूक्ष्म कथा : आबरू
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बड़ी बिन्ना को देखने वाले आ रहे थे |
तारीख जैसे जैसे करीब आती जा रही थी , बाऊ जी का नाखून चबाना बढ़ता जा रहा था |
वे बैठक को देखते और उखड़ा पलस्तर , झांकती संध को पाकर ऐसा अनुभव करते मानो सरे राह उनकी धोती खुल गयी है और कई जोड़ी आँखे उन्हें घूर रही हैं |
बिन्ना की माँ ने जब कहा कि बैठक की मरम्मत करा लो तो उन्होंने हिसाब लगाया और पाया कि जी.पी.एफ. एडवांस दहेज के लिये ही नाकाफी है यानी मरम्मत असंभव थी |
नाखून चबाते हुए उनकी नज़र सामने दीवार पर ठहर गयी जहाँ उनकी स्वर्गवासी माँ का माला पहना चित्र लगा था |पलस्तर वहाँ भी उखड़ा था लेकिन चित्र में छुप गया था |
बाउजी के दिमाग में बिजली कौंधी| वे तेज़ी से उठे और बाज़ार से लौटे तो साथ में कई चित्र थे | उन्होंने हर उखड़ी जगह और संध पर करीने से चित्र सजा दिये |अब देखा तो उनकी बैठक सर्व देव मंदिर में बदल चुकी थी |
लम्बी साँस छोड़ते हुए वे कृष्ण जी के चित्र के सामने आँख मूँदकर खड़े हो गये |
उन्होंने अनुभव किया कि उनका चीरहरण हो रहा है लेकिन कृष्ण जी ने धोती का पूरा थान खोलकर उनकी आबरू बचा ली है ||||
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बड़ी बिन्ना को देखने वाले आ रहे थे |
तारीख जैसे जैसे करीब आती जा रही थी , बाऊ जी का नाखून चबाना बढ़ता जा रहा था |
वे बैठक को देखते और उखड़ा पलस्तर , झांकती संध को पाकर ऐसा अनुभव करते मानो सरे राह उनकी धोती खुल गयी है और कई जोड़ी आँखे उन्हें घूर रही हैं |
बिन्ना की माँ ने जब कहा कि बैठक की मरम्मत करा लो तो उन्होंने हिसाब लगाया और पाया कि जी.पी.एफ. एडवांस दहेज के लिये ही नाकाफी है यानी मरम्मत असंभव थी |
नाखून चबाते हुए उनकी नज़र सामने दीवार पर ठहर गयी जहाँ उनकी स्वर्गवासी माँ का माला पहना चित्र लगा था |पलस्तर वहाँ भी उखड़ा था लेकिन चित्र में छुप गया था |
बाउजी के दिमाग में बिजली कौंधी| वे तेज़ी से उठे और बाज़ार से लौटे तो साथ में कई चित्र थे | उन्होंने हर उखड़ी जगह और संध पर करीने से चित्र सजा दिये |अब देखा तो उनकी बैठक सर्व देव मंदिर में बदल चुकी थी |
लम्बी साँस छोड़ते हुए वे कृष्ण जी के चित्र के सामने आँख मूँदकर खड़े हो गये |
उन्होंने अनुभव किया कि उनका चीरहरण हो रहा है लेकिन कृष्ण जी ने धोती का पूरा थान खोलकर उनकी आबरू बचा ली है ||||
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