सूक्ष्म कथा : जुड़वाँ (बतर्ज़ सिनेमास्कोप ‘दीवार’ )
****************************************वे जुड़वाँ थे | बचपन में एक बस्ती की तरफ खेलते हुए निकल गया |
जहाँ रिंग मास्टर की पारखी नज़र उस पर पड़ी और उसने उसे सर्कस में भर्ती कर लिया |
उसने रिंग मास्टर के कोड़े पर ऐसे करतब दिखाये कि लोगों ने दाँतो तले उँगली दबा ली |
वह ‘गब्बर’ के नाम से मशहूर हुआ |
दूसरा जंगल में खाता खेलता गुमनाम रहा आया |
यहाँ सुविधा के लिए उसे ‘बब्बर’ कह लेते है |
तो जनाब ....
माँ की बरसी पर जब दोनों मिले तो अपनी मोम से कड़क बनायी गयी मूँछो को ताव देता हुआ गब्बर गुर्राया . “ मेरे पास फाइव स्टार पिंजरा है |लंच में मुर्गा है, डिनर में बकरा है |अभिनन्दन ग्रन्थ हैं , सम्मान समारोह हैं |डिग्रियाँ हैं ,मेडल हैं|....तुम्हारे पास क्या है ?”
“मेरे पास जंगल है ,आज़ादी है |”...‘बब्बर’ दहाड़ा
और छलाँग मारकर झाड़ियों में गायब हो गया ||||
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