उज्जड
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वे मुझे तमाशबीन
निगाहों से देख रहे थे जब मै नूडल्स को उंगिलयों से उठाकर खा रहा था |
मै उनका मनोरंजन
था इसलिए बर्दास्त के भीतर था |
जब मै उनके सोफे
पर पालथी मारकर बैठ गया तो किसी ने इसे मेरी मौलिकता तो किसी ने प्राकृतिक अवस्था
कहा |
एक कृत्रिम महिला
ने मेरे पसीने की गंध को बेहद उद्दीपक बताया |
सब बढ़िया चल रहा
था | मै विजातीय होकर भी उनके बीच रम गया था |
पर जब किसी ने कमरे
की हवा गन्दी कर दी और सब लोगों ने परफ्यूम भींगे रूमाल नाक पर धर लिये, तब मुझसे
नहीं रहा गया |
मैंने उस बदतमीज
की हथेली पर लवण भास्कर चूर्ण रखा और उसे शौचालय की ओर धकेल दिया |
तभी उन्हें लगा कि
उनका पाँव गोबर में पड़ गया है |
सभा ने मुझे उज्जड कहकर फटकारा और बाउंसरों की मदद से
दरवाज़े के बाहर फेंक दिया ||||(चित्र गूगल साभार )
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