सूक्ष्म कथा : तमीज
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उसमे तमीज़ कूट कूट
कर भरी थी ...
दरवाज़ा खुला होता
है यहाँ तक कि मै भी सामने ही होता
फिर भी वो दरवाज़े
पर दस्तक देकर बा अदब पूछता
“क्या मै अंदर आ सकता हूँ ?”
पर उस दिन लगा कि
उसकी तमीज़ का मुरब्बा बनाकर उसे ही परोस दूँ ..
जब मेरे पैबंद लगे
गिरेबान को फाड़कर उसने भीतर झाँका ,
और ठठाकर हँसने लगा
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(चित्र गूगल साभार )

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