सूक्ष्म कथा : फैसला
“ तो तुमने कहा कि गाय पवित्र पशु नहीं है ?” कड़क आवाज़ कड़की
“ जी नहीं , मैंने सिर्फ ये कहा था कि बकरी भी पवित्र पशु है |” गले से एक फँसी आवाज़ निकली |
“ हूँ... मतलब तो वही हुआ ...सफाई में कुछ और कहोगे |” कड़क आवाज़ और कड़क हुई |
“ जी मुझे बताया गया था कि यहाँ सोचने की आजादी है |” फँसी आवाज़ और फँसती गयी |
“ बेशक.. मगर दूसरों की तरह सोचने की आज़ादी है ...हटकर सोचना द्रोह है ...तुम्हारी
कोई आख़री इच्छा ?” कड़क आवाज़ फंदे की तरह कस गयी थी |
“ जी मेरी खोपड़ी तोड़कर मेरा भेजा कुत्तों को खिला दें ...मै इस नामुराद चीज से छुटकारा
चाहता हूँ |” फँसी आवाज़ झटके से निकली और दीवारों पर सर पटकती रही
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आज भी शहर के
ऊपर सन्नाटे का गिद्ध चक्कर काट रहा है ||||
( चित्र : अद्रें
मोर्गन साभार गूगल )

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