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झालर


झालर
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मिलौनी गंज का आसमान शाम होते ही पतंगों से भर जाता
और सुनहरी शाम सतरंगी हो जाती |
पतंगें हम बच्चों के पँख थे जिनसे हम उड़ान भरते |
लेकिन मै अपनी पतंग उडाया नहीं करता था ..तैराया करता था |
दरअसल आसमान मेरा समन्दर था ....||
तो साहब ,
किस्म किस्म की ऊँची ऊँची पतंगों के बीच मेरी मामूली पतंग नीचे तैरती रहती लेकिन सारा मिलौनिगंज मेरी पतंग को  हसरत और शाबाशी भरी नज़रों से देखता रहता |
वजह थी पतंग की झालर जिसे मैंने सुनहरी गोट से सजा रखा था |
कोई उसे हनुमान की पूछ कहता तो कोई पतंग की चोटी..
लोगों की वाहवाही के साथ मेरी पतंग की झालर भी लंबी होती गयी |
एक दिन मैंने देखा कि मिलौनी गंज  उस झिलमिल सितारों वाली झालर  के लिए वाहवाही कर रहा था , जिसे मै नहीं बल्कि चौधरी का लड़का उड़ा रहा था ....
फिर क्या ?
मैंने वाह वाही की होड़ में पतंग के साथ दो झालर लगा दी ...फिर तीन ..फिर ४ ...|
मैं भूल गया था कि पतंग बराबर गोते खाकर नीचे आ रही थी ....|
आखिर में झालर के बोझ से दबी पतंग गूलर के ऊँचे पेड़ पर जा फँसी ...
मैंने उसे जब नीचे उतारा तो  झालरों  के अलावा कुछ नहीं बचा था ..|
जब मै फूट फूट कर रो रहा था तो अब्बा ने सर पर हाथ फेरते हुए कहा...
“.बेटा नाम की भूख कभी कभी काम को खा जाती है”....
आज जाने क्यों वो बात गूँज रही है ...
देखो मेरी पतंग कहीं फँस तो नहीं गयी ???

 (चित्र :गूगल साभार)

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