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झुर्रियो वाली परी


सूक्ष्म कथा : झुर्रियो वाली परी

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जिस बरस फसल में पाला लगा उसी बरस शहर में मेला लगा |
मन रखने को बाप बच्चो को लेकर मेला चला तो गया लेकिन हर मोड़ पर बच्चे मचल जाते और बाप खिसिया कर रह जाता |
मेले से लौटकर बच्चे बुक्का फाड़ कर रोये |
अगले दिन डोकरिया ने कहा “ चलो रे सब जन मेला ....”
और लौटकर आयी तो चमकने वाले फुंदने ,महकने वाला सुरमा ,बोलने वाली गुड़िया ...और जाने क्या क्या संग आया  ...??
मौड़ा  मौड़ी...पटेहरा वाली ,बैसा वाली , उढ़री भौजी सभी के लिए कुछ ना कुछ  .... कुर्मियाने  में जैसे झुर्रियों वाली सयानी परी उतर आयी थी .....
गौरा वाली का माथा ठनका तो दौड़कर मुडहर की पेटी को खोल कर देखा और सन्न रह गयी |
लाल आँखे और फड़कते नथुने लिए वो डोकरी के सामने पहुँची |
डोकरी हाथ नचाते हुए बोली .. “ चल रहन दे ...अब मेरी आँख के इलाज के ही तो पैसे थे ... अपने बच्चो को रोता देखने से तो अच्छा है कि उनकी हँसी ही सुनती रहूँ ..”
आँगन में उस वक्त झुर्रियो वाली परी के चारों ओर  हँसी खुशी का मेला लगा हुआ था ||||
(चित्र : गूगल साभार )

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