
सूक्ष्म कथा : बडो का खेल
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हुड़दंग की आवाज़ सुनकर ,मै दौड़कर वहाँ पहुँचा |
देखा तो दंग रह गया |
मैदान में रोज हिलमिल कर खेलने वाले बच्चे आज दंगे पर उतारू थे |
कुछ कह रहे थे कि यहाँ पहले से क्रिकेट खेलते आयें है इसलिये यहाँ क्रिकेट ही होगा|
कुछ का कहना था वे पहले आयें है और इसलिये यहाँ हॉकी खेलेगें |
“ इतना बड़ा मैदान है तुम लोग एक - एक छोर पर दोनों खेल खेल सकते हो |”
मैंने समझाना चाहा |
“अंकल आप हम लोगों के बीच में मत पडो....” कहकर उन्होंने मुझे धकिया दिया |
गाली गुफ्तार के बीच किसी को किसी का बल्ला छू गया ,तो किसी की हॉकी चल गयी |
और देखते देखते फूल से चेहरों पर खून की लकीरे खिच गयी |
“नालायक तू यहाँ क्यों आया था ...”अपने लहुलुहान बच्चे को उठाते हुए मै रो पड़ा |
“ पापा ...सॉरी...आज हम बच्चों ने गलती से तय किया कि चलो बडो का खेल खेल कर देखते हैं ...|”
...और एक कराह के साथ उसने आँख मूँद ली ...|
घर में पत्नी ने बताया कि बच्चे आज सुबह से ही टीवी मे भोजशाला वाला एपिसोड देख रहे थे ||||
( चित्र : सत्या नारायण ..गूगल से साभार )
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