९ बजे से शोभा की पुकार शुरू हो जाती है |
९ से १० हुआ तो भुनभुनाहट और नहीं आई तो शोभा
नाम का हाहाकार |
शोभा अपार्टमेंट के ८ घरों का झाड़ू ,पोछा और बासन है |
एक दिन उसके नाम का हाहाकार हुआ
और शाम को खुलासा कि शोभा का लड़का नहीं रहा
|
२ दिन झाड़ू-पोछा , जूठे बर्तन और हम शोभा की राह देखा किये |
तीसरे दिन जी कड़ा कर कड़ा कदम उठाने जा ही
रहे थे कि दरवाजे की घंटी बजी |
“ अरे आज तीसरे ही दिन आ गयी ...लड़के की चौथ तो कर लेती |” मैंने किसी तरह बनावटी सांत्वना में कहा |
“गरीब की क्या सौबर और क्या चौथ साहेब | बड़े लोग बड़ी बातें | मैं तो उसकी जचकी में भी तीसरे दिन आ गयी
थी और अब नासपीटे की मिटटी में भी तीसरे दिन..लड़का
तो चला गया ...पर पीछे ५ पेट अभी भी जुड़े हैं....साहेब
|” आँचल से आँखों की कोर पोछते हुए शोभा फर्श पोछने लगी |
उसने आगे कुछ नहीं कहा |
लेकिन उसका अनकहा आज भी मेरे ज़ेहन में गूंजता
है |
“जब पेट में आग लगती है तो रोग-शोक, नियम-धरम ..सब ##### # घुस
जाते हैं..साहेब |” |||||
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