सूक्ष्म कथा : लछमनिया -लछमी -लछमी बाई
..भइये..जब दाम
आता है तो आदमी बदले या ना बदले नाम ज़रूर बदल जाता है |
अब गाँव की नाउन
को ही लो |
जब तक हमारी बहू
,बेटियों की तेल मालिश कर फटे में गुजर बसर कर रही थी , तब तक हम लोगों की लछमनिया थी |
जब सेठ की छोटी
मलकिन की जचकी बाद इसे मालिश के बदले २
गिन्नी सोने की मिली और इसने घर पक्का करा लिया तो लछमनिया से गाँव की लछमी हो गयी
| फिर जब ज़मीदार को लकवा हुआ और ज़मीदार ने दिलखुश सेवा के बदले १४ बीघे का खेत इसके नाम कर दिया तो लछमी से कई गाँवों की लछमी बाई हो गयी |
........कन्वे
काका ने चुटिया में गाँठ मारते हुए ठहाका मारा और चिलम थाम ली
|
( चित्र: आई. आर . हेरी )

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