सूक्ष्म कथा :आचार्य का इलाज़
...आचार्य की सफलता का धूमकेतु जिस तेज़ी
से उभरा ,
उसी तेज़ी से उनका बहरापन भी बढ़ता गया |
लेकिन वो तब भीषण और लाइलाज़ हो गया ,
जब बुद्धि विपरीत होने से वे अपने मित्र
की श्रद्धांजलि सभा में जा पहुंचे |
जैसे जैसे तालियाँ बढ़ती गयी , उनके कान
सुन्न होते गये |
आचार्य को बहरे पन से मुक्ति तब मिली ,
जब उनके चेलों ने एक चमचा समागम आयोजित
किया और
भाड़े की खूब तालियाँ पिटवायी..|
ठीक होते ही आचार्य ने जो कहा उसका शिष्ट
भाषा में अर्थ यह है
कि सफलता दो बातों के प्रति असहिष्णु होती
पहली दूसरों के द्वारा छोड़ी हवा और
दूसरी.. दूसरों की प्रसंशा...||||
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