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सहबाइअन / ग्राफ्टी

सूक्ष्म कथा @सहबाइअन की थकान 
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सहबाइन शाम होते तक ऐसी थकी कि काउच पर पसर गयी | 
बूढ़ी नौकरानी दायाँ पाँव दबा रही थी और उसकी दुधमुंही नातिन बायाँ |
खुद सहबाइअन का बायाँ हाथ, दायें हाथ को दबा रहा था |
सुबह उन्होंने अपने हाथों पैडी क्योर किया |कुकिंग शो, फैशन शो और टेरो कार्ड के बीच न्यूज देखते हुए देश दुनिया के बारे में सोचा | दोपहर अपने हाथों आइब्रो सेट किये | फिर अपने हाथों फ्रूट मसाज की | खुद कमरे का ए. सी. चालू किया | दो बार अपने हाथ से पानी निकालकर पिया और ऐसा करते हुए उन्हें देश,समाज और परिवार ..के लिए शहीद होने का बोध भी हुआ |
लेकिन इतना सब कुछ करते करते वे इतना थक गयीं कि ‘ ब्रूनो’ के दुम हिलाने का लाड़ भरा जवाब नहीं दे पायीं | कालेज से देर लौटी लड़की को ब्याय फ्रेंड से बचकर रहने की नसीहत देना भी भूल गयी | यहाँ तक कि शेयर गिरने की खबर देखकर भी पति को फोन पर बुरे निवेश के लिए डांटने की ताकत भी उनमें नहीं बची थी |
कद्दू काउच बनी सहबाइन रह रह कर बैचेनी से घड़ी देख रही थी कि कब आठ बजें और वो जेक्शन जंक्सन में पार्टी के लिए रवाना हों |
जहाँ गाशिप के बीच ओरेंज सिप जैसे ही अन्दर उतरता है उनकी थकान अंगडाई लेकर मुस्कुराने लगती है ...||||


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ग्राफ्टी

‘वफा को वफा करना सिखा दूंगा 
मोहब्बत को मोहब्बत करना सिखा दूंगा |’
आदि आदि .... कोई यह अमर साहित्य प्रतिदिन स्टेडियम की दीवार पर खड़िया या पत्थर या ईट से खोद जाता था |साथ में लड़की का चेहरा और तीर लगा दिल वाला उल्टा पान भी | जिसके नीचे जमीन पर सिगरेट के अधजले टुकड़े और खाली केन पड़ी होती |
यह सिलसिला कुछ महीनों चला होगा कि दिल वाले पान से लहू का टपकना शुरू हो गया और शायरी में आह-आंसू की भरमार हो गयी ..
रोया भी करेगा आहे भी भरेगा 
दिल तुझे उम्र भर कोसा करेगा |’....
अब लड़की के चेहरे पर मोबाइल नम्बर भी लिखा मिलता और कुछ छिनालपने की बातें भी |
मैंने गौर किया कि अब खाली केन की जगह बियर और शराब की बोतले लुढ़की पड़ी रहती ... |
आगे के हफ़्तों में दीवार इतनी गन्दी हो गयी की मुझे देखने-पढ़ने में भी घिन छूट जाती और डर सा लगता | अब वहाँ विभिन्न लैंगिक क्रियाओं के घिनौने चित्र बने थे ..... जो देखने में ही बनाने वाले के मानसिक और भावनात्मक रूप से बीमार होने का संकेत देते |... दीवार के चित्रों को देखकर लगता कि इनके भीतर से कोई विक्षिप्त उतरेगा और .....####| 
अब वहाँ नीचे सिरिंज ... वाईटनर की खाली शीशियाँ लुढकी होतीं |साथ में “उल्टी और कै” भी पड़ी मिलती |
मै रोज़ सुबह यह सब देखते हुए सोचता कि इसकी शिकायत प्रबंधन से की जाये.......लेकिन घर लौटकर अगले दिन के लिए टाल जाता |
आज रोज की तरह सुबह जब स्टेडियम पहुंचा...तो पहले से ही भीड़ जमा थी किसी ने पुलिस को फोन कर बुला लिया था | सिरिंज ... वाईटनर की खाली शीशियाँ.. सिगरेट के टुकड़े ... और इनके बगल में एक औरत भी पड़ी थी ...जिसे नशे से बाहर लाने की कोशिश की जा रही थी ..उसे देखकर लगता था कि वह कोई मुसीबत की मारी रही होगी |
जमा लोग थोड़ी देर में इसी टापिक पर चर्चा करते हुए अपनी वाकिंग-जागिंग में जुट चुके थे ...लेकिन मै वापस लौट आया ...मुझे लग रहा था ... मै कही गलत था ...मै इसे रोक सकता था .... मैंने रोका क्यों नहीं ...????.||||

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